श्री पार्वती चालीसा |Shree Parvati Chalisa

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Last updated on August 27th, 2018 at 12:27 pm

माँ पार्वती चलीसा के  नित्य पाठ  करने से घर में सुख शांति बनी रहती हैं |आदि शक्ति माँ पार्वती , माँ दुर्गा ,  माँ काली , अन्नपूर्णा , गौरी ये सभी माँ पार्वती के ही रूप हैं |भक्तो पर करुणामयी माँ पार्वती अति शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं | आदिशक्ति माँ पार्वती की आराधना से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं |

इन मन्त्रो से करे माँ का ध्यान:-

” ॐ  उमामहेश्वराभ्यां नम : “
 “ॐ गौरये नम: “
 ” ॐ साम्ब शिवाय नम : “

 श्री पार्वती चालीसा

Shree Parvati Chalisa

 || दोहा ||

जय गिरी तनये द्क्षजे

शम्भू प्रिये गुनखानी |

गणपति जननी पार्वती अम्बे !

शक्ति ! भवानि ||

|| चौपाई ||

ब्रह्म भेद न तुम्हरे पावे ,

पंच बदन नित तुमको ध्यावै |

षडमुख न सकल यश तेरो ,

सहसबदन श्रम करत घनेरो ||

तेरो पार न पावत माता ,

स्थित रक्षा लय हित सजाता |

अधर प्रवाल सदृश अरुणारे ,

अति कमनीय नयन कजरारे ||

ललित ललाट विलेपित केसर,

कुंकुम अक्षत शोभा मनोहर |

कनक बसन क्ज्चुकि सजाये ,

 कटी मेखला दिव्य लहराये ||

कंठ मदार हार की शोभा ,

जाहि देखि सहजहि मन लोभा |

बालारुण अनंत छवि धारी ,

आभूषन की शोभा प्यारी ||

नाना रत्न जडित सिंहासन ,

तापर राजित हरि चतुरानन |

इन्द्रादिक परिवार पूजित ,

जग मृग नाग यक्ष रव कुंजित ||

गिर कैलाश निवासिनी जय जय ,

कोटिकप्रभा विकासिनी जय जय |

त्रिभुवन सकल , कुटुंब तिहारी ,

अणु – अणु महं तुम्हारी उजियारी ||

हैं महेश प्राणेश ! तुम्हारे ,

त्रिभुवन के जो नित रखवारे |

उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब ,

सुकृत पुरातन उदित भये तब ||

बूढा बैल सवारी जिनकी

महिमा का गावे कोऊ तिनकी ||

 सदा श्मशान विहारी शंकर ,

आभूषण हैं भुजंग भयंकर ||

कंठ हलाहल को छवि छायी ,

नीलकंठ की पदवी पाई |

देव मग्न के हित अस कीन्हो ,

विष लै आयु तिन्ही अमि दीन्हो ||

ताकी ,

तुम पत्नी छवि धारिणी ,

दुरित विदारिणी मंगल कारिणी |

देखि परम सौन्दर्य तिहारो ,

त्रिभुवन चकित बनावन हारो ||

भय भीता सो माता गंगा ,

लज्जा मय हैं सलिल तरंगा ||

सौत सामान शम्भू पह आई ,

विष्णु पदाब्ज छोड़ी सो धायी ||

तेहिको कमल बदन मुर्छायो ,

लखी सत्वर शिव शीश चढायो |

नित्यानंद करी वरदायिनी ,

अभय भक्त कर नित अंपायिनी ||

अखिल पाप त्रयताप निकन्द्नी ,

माहेश्वरी , हिमालय नन्दिनी | काशी पूरी सदा मन भायी ,

सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी ||

भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री ,

कृपा प्रमोद स्नेह विधात्री |

 रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे ,

वाचा सिद्धि करी अव्लम्बे ||

गौरी उमा शंकरी काली ,

अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली |

सब जन की इश्वरी भगवती ,

पतप्राणा परमेश्वरी सती ||

तुमने कठिन तपस्या किन्ही ,

नारद सो जब शिक्षा लीनी |

अन्न न नीर न वायु अहारा ,

अस्थि मात्रतन भयऊ तुम्हारा ||

पत्र घास को खाद्य न भायऊ ,

उमा नाम तब तुमने पायउ |

तप बिलोकी ऋषि सात पधारे ,

लगे डिगावन डिगी न हारे ||

तव तव जय जय जय उच्चारेउ ,

सप्तऋषि , निज गेहू सिद्धारेउ ,|

सुर विधि विष्णु पास तब आए ,

वर देने के वचन सुनाए ||

मांगे उमा वर पति तुम तिनसो ,

चाहत जग त्रिभुवन निधि , जिनसों |

एवमस्तु कही ते दोऊ गए ,

सुफल मनोरथ तुमने लए ||

करि विवाह शिव सो हे भामा ,

पुनः कहाई हर की बामा |

जो पढ़ीहै जन यह चालीसा ,

धन जनसुख देइहै तेहि ईसा ||

 || दोहा ||

कूट चन्द्रिका सुभग शिर

जयति सुख खानी

पार्वती निज भक्त हित

रहहु सदा वरदानी |

|| इति श्री पार्वती चालीसा

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