सोलह सोमवार व्रत कथा

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Last updated on December 19th, 2017 at 09:00 pm

मृत्यु लोक में भ्रमण करने की इच्छा से भगवान भोले  नाथ शिव माता पार्वती के साथ धरणी { प्रथ्वी ] पर पधारे | भ्रमण करते – करते दोनों विदर्भ देश अमरावती नामक अत्यंत सुन्दर रमणीक नगर में पहुचे | वह नगर अत्यंत सुन्दर और रमणीक था | वहाँ के राजा के द्वारा बनवाया गया एक अत्यंत सुन्दर रमणीक  शिवजी का मन्दिर था | भगवान शिव तथा माँ पार्वती मन्दिर में निवास करने लगे |

एक समय माता पार्वती ने शिवजी को अत्यंत प्रसन्न देख मनोविनोद करने की इच्छा से बोली – हे प्रभु ! “ आज तो हम दोनों चौसर खेलेंगे | “ शिवजी ने माँ पार्वती की बात मान ली | उसी समय मन्दिर का पुजारी वहाँ पूजा करने आया | माता पार्वती ने ब्राह्मण से पूछा – “  खेल में कौन जीतेगा “  ब्राह्मण ने कुछ विचार कर कहा भगवान शिव की विजय होगी | कुछ समय में खेल समाप्त हो गया और माँ पार्वती ब्राह्मण के झूट बोलने के अपराध के कारण अत्यंत क्रोधित हो गई और ब्राह्मण को श्राप देने को उद्धत हो गई | भगवान शिव ने बहुत समझाया पर माँ पार्वती नहि मानी और ब्राह्मण को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया |

कुछ समय बाद माँ पार्वती के श्राप के कारण ब्राह्मण के शरीर पर कोढ़ हो गया |वह अनेक प्रकार से दुखी रहने लगा | देवलोक की अप्सराये पृथ्वी पर उसी मन्दिर में भगवान शिव का पूजन करने आई , उन्होंने ब्राह्मण को अत्यंत दुखी देखा और उसके [ रोगी ] दुःख का कारण पूछा – “ ब्राह्मण ने विस्तार पूर्वक सारी बात बताई | तब अप्सराओ ने कहा की अब आपको दुखी होने की आवश्यकता नहीं हैं | भगवान  शिव की कृपा से सब ठीक हो जायेगा |

तुम सब व्रतो में श्रेष्ट सोलह सोमवार का व्रत भक्तिपूर्वक करना | ब्राह्मण ने विनम्रता से सोलह सोमवार की विधि पूछी | अप्सराओ ने बताया —- सोमवार का भक्ति के साथ व्रत करें | स्वच्छ वस्त्र पहने | संध्या व उपासना के बाद आधा सेर गेहु का आता ले , उसके तीन अंग बनाएँ और घी गुड , दीप ,नैवैद्ध्य , पुंगी फल , बेलपत्र , जनेऊ जौड़ा , चन्दन , अक्षत , पुष्पादी के द्वारा प्रदोष काल में भगवान शिव का विधि से पूजन करे | तत्पश्चात एक अंग शिवजी को अर्पण करे ,एक को उपस्थित जनों में प्रसाद के रूप में बाँट दो ,और एक आप प्रसाद के रूप में ले लेवें | इस विधि से सोलह सोमवार व्रत करें | सत्रहवें सोमवार को सवासेर चूरमे की बनती बनाये | उसमे घी गुड मिलाकर चूरमा बनाये | भगवान भोले नाथ को भोग लगाकर प्रसाद उपस्थित जनों में बाँट दे तथा स्वयं कुटुम्ब सहित स्वयं प्रसाद ले तो शिव जी की कृपा से सबकी मनोकामनाये पूर्ण होगी ऐसा कहकर अप्सराये स्वर्ग लोक चली गई | ब्राह्मण ने यथाविधि सोलह सोमवार के व्रत किया और भगवान शिव की कृपा से ब्राह्मण रोग मुक्त होकर आनन्द से रहने लगा |

कुछ समय बाद शिवजी और माँ पार्वती उसी मन्दिर में पधारे | ब्राह्मण को निरोग देख माँ पार्वती ने ब्राह्मण से रोग मुक्त होने का उपाय पूछा तो ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत की कथा सुनाई |  माँ पार्वती ने कथा सुनकर सोलह सोमवार का व्रत स्वयं करने का सोचा | पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न मन से व्रत की विधि पूछकर स्वयं व्रत किया और व्रत के प्रभाव से उनके रूठे हुए पुत्र कार्तिकेय स्वयं माँ पार्वती के आज्ञाकारी हुए | कार्तिकेय ने माँ पार्वती से पूछा की – हे माँ आपने ऐसा कौनसा उपाय किया की –“ मैं आपका इतना आज्ञाकारी हो गया “ | तब माता पार्वती ने प्रसन्न मन से सोलह सोमवार व्रत की कथा उनको सुनाई | कार्तिकेय जी ने कहा — “ इस व्रत को मैं करूंगा , क्यों की मेरा मित्र बहुत दुखी मन से प्रदेश गया हैं | मेरी उससे मिलने की बहुत इच्छा हैं |कार्तिकेय जी ने भी इस व्रत को किया और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उनका मित्र उनको मिल गया | इस आकस्मिक मिलंन का भेद कार्तिकेय के मित्र ने पूछा “ तो वे बोले — “ हे मित्र  ! हमने तुम्हारे मिलने की इच्चा करके सोलह सोमवार व्रत किया था |

“कार्तिकेय के मित्र की विवाह करने की इच्छा हुई | उसने कार्तिकेय जी से व्रत की विधि पूछी तथा यथाविधि व्रत किया | व्रत के प्रभाव से जब किसी कार्यक्रम में गये तो वहाँ के राजा की कन्या का स्वयंवर था | राजा ने प्रण किया की जिस वर के गले में यह हथिनी माला डालेगी उसी से मैं अपनी कन्या का विवाह करूंगा | शिवजी की कृपा से वह मित्र भी  राजसभा में एक और बैठ गया  | हथिनी ने माला ब्राह्मण {मित्र } के गले मैं डाल दी | राजा ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उसका विवाह ब्राह्मण [ मित्र } के साथ कर दिया |ब्राह्मण सुन्दर राजकन्य पाकर सुख़ से जीवन यापन करने लगा |

एक दिन राजकन्य ने अपने पति से प्रश्न किया की आपने ऐसा कौनसा तप किया जिसके व्रत के प्रभाव से मैं आपको मिली | तब ब्राह्मण ने कहा मैंने अपने मित्र के बताये अनुसार स्प्ल्ह सोमवार का व्रत किया जिसके प्रभाव से तुम जैसी रूपवान गुणवान तथा आज्ञाकारी पत्नी मिली  | उसके भी मन मैं पुत्र प्राप्ति की इच्छा से व्रत प्रारभ कर दिया | व्रत के प्रभाव से उसने अत्यंत रूपवान गुणवान अति सुन्दर , शुशील , धर्मात्मा और विद्धवान पुत्र उत्पन्न हुआ |माता पिता दोनों उस देव पुत्र को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए , उसका लालन पालन भली प्रकार से करने लगे | जब पुत्र समझदार हुआ तो एक दिन अपनी माँ से बोला – “ हे माँ आपने ऐसा कौनसा तप किया ,व्रत किया जिसके प्रभाव से मैं आपके गर्भ से उत्पन्न हुआ | ’’माता ने सोलह स्प्म्वर व्रत की कथा सुनाई | पुत्र के मन में राज्याधिकार पाने की इच्छा हुई और उसने सोलह सोमवार व्रत करने लगा |

व्रत शुरू करने के बाद एक देश के राजा के दूतों ने आकर उसको राजकन्या की लिए वरण किया | राजा ने अपनी कन्या का विवाह उस ब्राह्मण युवक से कर अत्यंत प्रसन्न हुआ |और ब्राह्मण को इस देश का राजा बना दिया , क्यों की उस राजा के कोई पुत्र नहीं था | राज्य का उतराधिकारी होकर भी वह सोलह सोमवार व्रत करता रहा | जब सत्रहवीं सोमवार आया तो विप्र पुत्र ने अपनी प्रियतमा  पूजन सामग्री लेकर शिव पूजा के लिए शिवालय चलने को कहा | पर वह नहीं गई | दास दासियों के साथ सारी सामग्री भेज दी पर वह नहीं गई |

जब राजा ने शिवजी का पूजन समाप्त किया तो आकाशवाणी हुई — “ हे राजा ! अपनी इस रानी को राजमहल से निकाल दे , नहीं तो वह तेरा सर्वनाश कर देंगी |” राजा ने सभी सभासदों को बुलाया और आकाशवाणी के बारे में बताया सब चिंता में दूब गये की जिस रानी की वजह से राज – पाठ मिला हैं आज राजा उसी रानी को निकालने का षड्यंत्र रच रहा हैं |

राजा ने अपनी पत्नी को राजमहल से निकाल दिया | रानी दुखी हृदय से अपने भग्य को कोसते हुए नगर के बहर चली गई , उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था | वह भूखी प्यासी एक नगर में पहुची वहाँ एक बुढिया मिली जों सूत बेच रही थी | रानी ने उसकी मदद करने के मन से पोटली अपने सिर पर सूत की टोकरी रख कर चली और आंधी आ गई और बुढिया का सूत उड़ गया |बेचारी बुढिया पछताती रही और बुढिया ने रानी को अपने से दुर रहने को कहा | इसके बाद रानी एक तेली के घर गई तो शिवजी के प्रकोप के कारण तेली के सारे मटके चटक गये | तेली ने भी रानी को अपने घर से निकाल दिया | अत्यंत दुःख पते हुए रानी एक नदी के तट पर पहुची और पानी पिने से पहले ही नदी का जल सुख़ गया | उसके बाद रानी एक वन में गई आयर वहा के तालाब का पानी भी असंख्य कीड़ों में बदल गया | रानी ने पेड़ की छाया में विश्राम करना चाहा तो पेड़ सुख़ गया | रानी की यह ही दशा कुछ ग्वाले देख रहे थे | ग्वालो ने मन्दिर के पुजारीजी से इसका उपाय पूछा पुजारी जी के आदेशानुसार रानी को ग्वाले पुजारी जी के पास लाये | पुजारी जी देखते ही समझ गये की यह अवश्य ही विधि की गति की मारी कोई कुलीन स्त्री हैं | पुजारीजी ने रानी से कहा — “ पुत्री मैं तुम्हे अपनी पुत्री के समान रखूंगा तुम मेरे आश्रम में रहों | पुजारी जी के वचन सुन कर रानी को धीरज हुआ , और रानी आश्रम में रहने लगी | रानी खाना बनाती , पानी भर्ती उसमे कीड़े पड जाते | पुजारी जी ने दुखी मन से रानी से पूछा की तुम पर कोनसे देवता का कोप हैं | तब रानी ने शिवजी की पूजा में न जाने वाली बात बताई | तो पुजारी जी शिवजी का ध्यान करते हुए रानी को  सब मनोरथ पूर्ण करने वाले सोलह सोमवार का व्रत करने को कहा | पुजारी जी के आदेश से रानी ने सोलह सोमवार के विधिपूर्वक व्रत किये | सत्रहवें सोमवार को विधि – विधान से पूजन किया | व्रत के प्रभाव से राजा को रानी की याद आई और सैनिको सहित रानी की खोज की और राजा ने पुजारी जी को सारी बात बताई और कहा की यह मेरी पत्नी हैं |  पुजारी जी को विश्वास हुआ और पुजारी जी की आज्ञा से राजा रानी को पुरे सम्मान के साथ महल ले आये |  वैदिक मन्त्रोच्चार से रानी का राजमहल में प्रवेश हुआ | नगर वासियों ने नगर को बन्दनवारो से सजाया | हर घर में मंगल गान होने लगा | याचको को धन – धान्य भेट किया , ब्राह्मणों को दान दिया |

इस प्रकार से राजा शिवजी की कृपा का पात्र हो राजमहल में राजा के साथ अनेक प्रकार के सुख़ भोग करता सोलह सोमवार का विधिपूर्वक पूजन करता हुआ , इस लोक में सुख़ भोग कर शिवलोक में स्थान प्राप्त किया |

 जों जिस मनोकामना से यह व्रत करता हैं उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती | विवाह योग्य कन्या को उत्तम वर , उत्तम गुण , रूप सौन्दर्य तथा स्त्रियों को अनेक गुण वाली सन्तान , सुवर्ण , वस्त्र ,और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती हैं | तथा पति पत्नी का कभी वियोग नहीं होता तथा अंत में शिव लोक में निवास करते हैं | यह व्रत एश्वर्य को प्रदान करने वाला हैं | जिस घर के स्त्री पुरुष इस व्रत को करते हैं उस घर में हमेशा भगवान शंकर तथा माँ पार्वती की कृपा रहती हैं |

                         || जय भोले नाथ ||