🕉 जय श्री राम  |  हर हर महादेव
Hindi English
भारतीय परम्परा

अथाष्टादशोऽध्यायः- मोक्षसंन्यासयोग

अथाष्टादशोऽध्यायः- मोक्षसंन्यासयोग

श्रीमद्भगवद्गीता

अथाष्टादशोऽध्यायः- मोक्षसंन्यासयोग

क्रमशः–

 

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।

योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

 

हे पार्थ ! जिस अव्यभिचारिणी धारणशक्ति से 【भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है, वह ‘अव्यभिचारिणी धारणा’ है।】मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को 【मन, प्राण और इन्द्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिये भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम ‘उनकी क्रियाओं को धारण करना’ है।】धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है ॥३३॥

 

यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।

प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥

 

परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन ! फल की इच्छा वाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यन्त आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारणशक्ति राजसी है ॥ ३४ ॥

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.