Maharishi Dadhichi ka Devtaon Ko Asthidan Aur Vajr Nirman Ki Katha | वृतासुर से त्रस्त देवताओं को महर्षि दधिची का अस्थि दान और वज्र निर्माण की कथा

Maharishi  Dadhichi ka Devtaon  Ko Asthidan Aur Vajr Nirman Ki Katha

वृतासुर से त्रस्त देवताओं को महर्षि दधिची का अस्थि दान और वज्र निर्माण की कथा

सत्ययुग की बात हैं , दैत्यों के बहुत भयंकर दल थे , जो कल्की नाम से विख्यात थे | उनका स्वभाव अत्यंत निर्दयी था | असुर दल युद्ध में उन्मुक्त होकर लड़ता था | सभी असुरो ने वृतासुर के साथ मिलकर इन्द्रलोक / स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया |तब समस्त देवगण वृतासुर का वध करना चाहते थे परन्तु वृतासुर की आसुरी शक्ति के सामने देवगण अति निर्बल दिख रहे थे | सभी देवगण ब्रह्माजी की शरण में गये और हाथ जोड़ कर निवेदन करने लगे | तब ब्रह्माजी ने  देवताओं से कहा – देवताओं ! तुम जिस कार्य की सिद्धि के लिए मेरे पास आये हो वह मुझे ज्ञात हैं | मैं तुम्हे वृतासुर के वध का एक उपाय बताता हूँ जिससे तुम वृतासुर का वध कर सकोगे |

महर्षि दधिची नाम से विख्यात अत्यंत दयावान महर्षि हैं उनकी शरण में जाकर समस्त देवगण एक सुर में एक ही वर मागों | वे बड़े धर्मात्मा हैं | तुम्हे तुम्हारी मनचाही वस्तु प्रदान करेंगे | जब वे वर देने को आतुर हो जाये तब तुम सभी देवगण विजय की अभिलाषा से एक साथ यों कहना – महात्मन ! आप तीनों लोको के हित के लिए अपनी अस्थियों हमें [ देवताओं ]  प्रदान करे जिससे हम अत्यंत भयंकर वज्र का निर्माण कर वृतासुर नामक असुर का वध करेंगे | जिसकी आकृति षट्कोण के समान होगी | वह वज्र महान एव घोर शत्रु नाशक होगा | ये सब बाते मैंने तुम्हे बतला दी हैं | अत: अब तुम शीघ्रता करों |

ब्रह्माजी के ये वचन सुन कर सभी देवता भगवान नारायण को साथ लेकर महर्षि दधिची के आश्रम पर गये |वी आश्रम सरस्वती नदी के उस पार था | वह आश्रम बेलों और लताओं से घिरा हुआ था , भ्रमरों की ध्वनी से गुंजायमान हो रहा था , ब्राह्मणों के द्वारा सामवेद के पाठ से अत्यधिक शोभा पा  रहा था | वहा जगली जानवर , गाये अन्य पशु चारो और भ्रमण कर रहे थे | वहा के सरोवर पर हाथी हथनीया पानी पी रहे थे |महर्षि दधिची का वह आश्रम स्वर्ग के समान शोभा पा रहा था | समस्त देवगण वहा आ पहुंचे |

उन्होंने देखा , महर्षि दधिची भगवान सूर्य के तेज के समान प्रकाशित हो रहे थे | उनके शरीर की तेज कांति से साक्षात् ब्रह्माजी जान पड़ते थे |

राजन ! उस समय देवताओं ने महर्षि के चरणों में प्रणाम करके ब्रह्माजी के कहे अनुसार वर माँगा | तब महर्षि दधिची ने प्रसन्न होकर उन श्रेष्ठ देवताओं से इस प्रकार कहा – देवगण आज में वही करूंगा जिसमें तुम्हारा हित निहित हो | अपनी इस देह का त्याग में स्वयं कर देता हूँ |ऐसा कहकर मुनियों में श्रेष्ठ जितेन्द्रिय उदार महर्षि दधिची ने सहसा अपने प्राणों का त्याग कर दिया |तब देवताओं ने ब्रह्माजी के उपदेश के अनुसार महर्षि के निर्जीव शरीर से हड्डिया ले ली |

इसके पश्चात समस्त देवगण विजय की इच्छा लिए त्वष्टा प्रजापति के पास आयें और उन्हें अपना प्रयोजन समझाया | देवताओं की बात सुनकर त्वष्टा प्रजापति अत्यधिक प्रसन्न हुए | उन्होंने अपने तप के बल से एक अत्यंत भयंकर वज्र का निर्माण किया और देवराज इंद्र को वह वज्र दिया | वज्र को धारण कर देवराज इंद्र को बड़ी प्रसन्ता हुई , उन्होंने शुद्ध चित होकर वज्र को धारण कर लिया |  

महर्षि दधिची की सदा ही जय हो

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