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घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग महादेव की कथा। Ghushmeshwar jyotirling Mahadev ki katha

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग महादेव की कथा। Ghushmeshwar jyotirling Mahadev ki katha

शिव पुराण के ज्ञान खंड में भगवान को घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा का वर्णन किया गया है । घुश्मेश्वर  ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से सब पाप दूर हो जाते हैं और सुख समृद्धि की वृद्धि होती है यहां सुख इस प्रकार बढ़ता है जिस प्रकार शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की बढ़ोतरी होती है । घुशमेश्वर महादेव का यह माहात्म्य सुनने से सुख में बढ़ोतरी होती है कष्ट स्वत ही दूर हो जाते हैं ।

आइए घुश्मेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग की कथा सुनते हैं ।

देवगिरि पर्वतके निकट सुधर्मा नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था ।वह अत्यन्त धर्मनिष्ठ एवं पतिव्रता थी। परन्तु इनके कोई सन्तान नहीं थी।पती पत्नी संतान नहीं होने के कारण सदैव चिन्तित रहते थे। ज्योतिषियों की के बताए अनुसार अनुसार सुधर्मा ने सुदेहा की छोटी बहन घुश्माके साथ विवाह कर लिया । इसमें सुदेहा भी सहमत थी। घुश्मा भगवान शिव कि प्रिय भक्त थी । वह प्रतिदिन 108 पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनका पूजन करती । भगवान् शंकर जी के वरदान से शीघ्र ही घुश्मा सुन्दर पुत्र की माता बनी । आनन्द-मङ्गल छा गया। इधर धीरे-धीरे सुदेहा अपनी बहन घुश्मा एवं उसके बालक से ईर्ष्या-भाव रखने लगी। यह ईर्ष्या यहाँतक बढ़ी कि एक दिन रात्रिमें उसने घुश्माके पुत्रकी हत्या कर उसके शवको ले जाकर उस सरोवरमें डाल दिया, जिसमें घुश्मा जाकर पार्थिव-शिवलिङ्गों को विसर्जित करती थी।

 

 

 

दुसरे दिन जब प्रातःकाल घुश्मा अपनी पुजा करने उस सरोवर पर गयी । घुश्मा ने पार्थिवपूजा समाप्त कर शिवलिङ्गके विसर्जनके लिये उस सरोवरमें गयी तो भगवान् शिवकी कृपासे शिवलिङ्गोंके विसर्जनके पश्चात् उसका पुत्र जीवित होकर सरोवर से बाहर निकल आया। पुत्र को देखकर उसे न पुत्रकी मृत्युका दुःख था, न उसके जीवित होनेपर सुख । उसकी सच्ची भक्ति को देखकर भगवान् आशुतोष घुश्मा के सामने प्रकट हो गये। उन्होंने घुश्मासे वर माँगनेको कहा। तब घुश्माने कहा – ‘प्रभो ! आप सदैव इस स्थान पर निवास करें । इससे सम्पूर्ण संसारका’ और मेरे जैस सच्चे भक्तों का कल्याण होगा। भगवान शंकर ने तथास्तु कह दिया । और घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से वही स्थापित हो गए । उसे सरोवर का नाम भी शिवालय के नाम से जाना जाता है ।

 

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