मानस पूजा { Manas Pooja }

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मानस पूजा  { Manas Pooja }

मानस पूजा { मन: कल्पित पूजा ] भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं हैं , वे तो भाव के भूखे हैं | पुराणों में मानस पूजा का विशेष महत्व हैं | शास्त्रों में पूजा को हजार गुना अधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए एक उपाय बतलाया गया हैं | वह मानस पूजा | जिसे पूजा से पहले करके फिर बाह्य वस्तुओं से पूजन करे | मानस पूजा से मन की एकाग्रता बढती हैं | मानस पूजा में चन्दन , धूप , दीप , नैवैध्य भी भगवान को करौड गुना अधिक संतोष प्रदान करने वाले हैं | अत: मानस पूजा विशेष फलदाई हैं

वैसे तो भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती भगवान तो केवल भाव के भूखे हैं | मन कल्पित पूजा के द्वारा संसार में जो दिव्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं | उनसे भी ईश्वर की पूजा की जा सके | इसलिए पुराणों में मानस पूजा पर बल दिया गया हैं |

मानस पूजा में भक्त अपने इष्ट देव को सम्पूर्ण रत्नों से रत्नजडित सिंहासन पर विराजमान कराता हैं | स्वर्ग लोक की मन्दाकिनी गंगा के जल से अपने इष्टदेव को स्नान कराता हैं , कामधेनु गाय के दुग्ध से पंचामृत का निर्माण करता हैं | वस्त्राभूषण भी भक्त की कल्पना के अनुरूप दिव्य अलौकिक होते हैं | पृथ्वी रूपी गंध का अनुलेपन करता हैं | अपने इष्टदेव के लिए कुबेर की पुष्पवाटिका में स्वर्ण कमल पुष्पों का चयन करता हैं | भावना से वायु रूपी धुप , अग्निरूपी दीपक तथा अमृतरूपी नैवैध्य अपने इष्टदेव को अर्पण करने की विधि हैं |

इसके साथ ही त्रिलोक की सम्पूर्ण वस्तु सभी उपचार परमात्मा प्रभु के चरणोंमें भक्त अपने इष्ट देव को अर्पित करता हैं | यह हैं मानस पूजा का स्वरूप |

ॐ लं पर्थिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि |

प्रभु ! मैं चन्दन आपको अर्पित करता हूँ |

ॐ हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि |

प्रभु ! आकाशरूप पुष्प आपको अर्पित करता हूँ |

ॐ यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि |

हे प्रभो ! मैं वायुदेवरूप में धुप आपको प्रदान करता हूँ |

ॐ रं व्हन्यात्मकं दीप दर्शयामि |

प्रभु  ! अग्निदेव रूप में दीपक आपको अर्पित करता हूँ |

ॐ वं अमृतात्मकं नैवैध्य निवेदयामि |

प्रभु ! मैं अमृत के समान नैवैध्य आपको अर्पित करता हूँ |

 ॐ सौं सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि |

प्रभु ! मैं सर्वात्मा के रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके श्री चरणों में समर्पित करता हूँ | इन मन्त्रों से भावपूर्ण मानस पूजा की जा सकती हैं |

मानस पूजा में भक्त अपना समय इष्टदेव की आराधना में बिताता हैं , और भक्त का मन निहाल हो जाता हैं | मन को एकाग्र कर संसार से दूर होकर भगवान की सेवा में तत्पर हो जाता हैं | अपने इष्टदेव के लिए बढिया से बढिया रत्नजडित आसन , सुगन्धित पुष्प की कल्पना करता हैं और भ्क्प का मन यहाँ से वहाँ कल्पनाओं की उड़ान भरने की इस पूजा में पूरी छुट होती हैं | मानस पूजा करने वाले आराधक को अदभुद सुख की प्राप्ति होती हैं | वैसे तो मानस पूजा का इतना प्रचार नहीं हैं पर इसे जरुर अपनाना चाहिए |