AshaBhagoti Vrat Katha , Vrat Pujan vidhi , Udayapan Vidhi , | आशा भगौती व्रत कथा , व्रत पूजन , उद्यापन विधि , व्रत का महत्त्व

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Last updated on October 5th, 2018 at 02:07 pm

आशा भगौती व्रत का महत्त्व

आशा भगौती व्रत सभी आशाओं को पूर्ण करने वाला व्रत हैं | इस व्रत को करने से व्यक्ति पाप मुक्त हो स्वर्ग में निवास करता हैं | यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं के द्वारा किया जाता हैं | आशा भगौती व्रत आश्विन मास [ श्राद्ध पक्ष ] की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारम्भ होकर आठ दिन अमावस्या तक चलता हैं |

आशा भगौती व्रत पूजन विधि

इस व्रत की पूजा की सामग्री पूजन करती हुई महिलाओं को पुरुषो [ लडको ] को नहीं दिखाना चाहिए |

पूजा का स्थान ऐसे स्थान पर रखे जहा घर के पुरुष , लडके नहीं जावे |

एक पाटा लेकर उस पर गोबर अथवा पीली मिट्टी से लीपकर आठ गोले [ कंगूरे ] बनाये |

इन आठ कोनों पर आठ – आठ दूब , आठ – आठ रूपये , काजल , मेहँदी , रोली , मोली , एक – एक फल सभी कोनों पर चढ़ावे |

आठो कोनो पर दीपक जलावे |

इस विधि को नित्य स्नानादि से निर्वत होकर शुद्ध वस्त्र धारण कर आठ दिन तक पूजन कर आशा भगौती व्रत कथा सुने |

आठवे दिन एक एक सुहाग पिटारी , मीठी पापड़ी आठ , आठों कोनों पर चढ़ावे |

आठ पापड़ी [ मैदे से बनी मीठी पापड़ी ] का बायना निकाल कर सासुजी , आठ पापड़ी आप स्वयं खाये |

यह व्रत आठ वर्ष तक किया जाता हैं |

नवें वर्ष उद्यापन कर देवे |

आशा भगौती उद्यापन विधि

जिस वर्ष में उद्यापन करना हो , उस वर्ष आठ सुहाग पिटारी से काजल , बिंदी , चूड़ी , मेहँदी , बिछिया , बेस [ साड़ी ब्लाउज ] , दर्पण , कंघा , सिंदूर , रोली आदि श्रद्धा एवं सामर्थ्यानुसार रखकर उसमें चार मिट्ठी व चार फीकी पापड़ी रखकर इन पर सात बार हाथ फेर आठ सुहागिन स्त्रियो को भोजन करवा कर दे देवे |

आशा भगौती व्रत की कहानी

हिमाचल नाम के एक राजा थे | जिनके दो पुत्रिया थी एक का नाम गौरा और एक का नाम पार्वती था | एक दिन राजा के मन में सवाल आया की मेरे राज्य की प्रजा किसके भाग्य का खाती हैं | राजा ने सबसे पूछा सबने एक ही जवाब दिया | महाराज आपके भाग्य का तब राजा ने अपनी दोनों पुत्रियों को बुलाया और पूछा गौरा पार्वती तुम किसके भाग्य का खाती हो तब गौरा ने कहा – मैं आपके भाग्य का खाती हूँ और पार्वती ने कहा – ‘ मैं मेरे भाग्य का कहती हूँ | इससे राजा ने क्रोधित मन से गौरा का विवाह राज परिवार में और पार्वती का विवाह शिवजी के साथ कर दिया |

शिवजी पार्वती को लेकर कैलाश चल दिए | रास्ते में जहां भी पार्वती का पैर पड़ता वहां की दूब जल जाती | इसको देखकर शिवजी ने विद्धवानो से पूछा तो उन्होंने बतलाया की यदि पार्वती जी पीहर जाकर आशा भगौती व्रत का उद्यापन कर दे तो दोष मिट जायेगा | पंडितो के बताने पर शिवजी और पार्वती जी अच्छे – अच्छे मूल्यवान वस्त्र धारण कर गहने पहनकर पार्वती के पीहर चले गये |

रास्ते में एक नगर आया जहा सब लोग उदास थे पार्वती जी ने पूछा इस नगर में इतनी शांति कैसे हैं ? तब दासी ने बतलाया की रानी के सन्तान होने वाली हैं ? इसलिए सब दुखी हैं | पार्वती जी ने रानी के दुःख को देखकर शिवजी से कहा हे नाथ ! मेरी कोख बंद कर [ बाँध ] दो | शिवजी ने मना कर दिया | आगे चले तो जंगल में एक घोड़ी के बच्चा होने वाला था घोड़ी दर्द से तड़प रही थी पार्वती ने जिद्द कर ली की हे प्राणनाथ मेरी कोख बांध दो | शिवजी ने पार्वती को समझाया की कोख मत बंद करवाओं नहीं तो बाद में पछ्ताओंगी पर पार्वती नहीं मानी शिवजी ने कोख बंद कर दी |

पार्वती की बहन गौरा अपने ससुराल में बहुत दुखी थी | पार्वती पीहर पहुची तो पीहर वालो ने पहचाना नही तब पार्वती ने सारी बात बतलाई तो राजा ने पार्वती से पूछा तुम किसके भाग्य का खाती हो तो पार्वती ने कहा मैं मेरे भाग्य का खाती हूँ | पार्वती अपनी भाभियों के पास चली गई | पार्वती की भाभिया आशा भगौती का उद्यापन कर रही थी , तब पार्वती ने कहा मेरे उद्यापन की तैयारी नहीं हैं नहीं तो मैं भी आशा भगौती व्रत का उद्यापन कर देती | तब भाभियाँ बोली , “ तुम्हे क्या कमी हैं ? तुम शिवजी से खो सब तैयारी कर देंगे “ तो पार्वती ने शिवजी से सामग्री लाने को कहा तो शिवजी ने एक अंगूठी देते हुए कहा इससे तुम जो भी मांगोगी मिल जायेगा |

पार्वती जी ने उस मुद्रिका से सारी उद्यापन सामग्री मांग ली , सब ने मिलकर धूमधाम से उद्यापन कर दिया | ससुर जी ने शिवजी को भोजन करने बिठाया भोजन में अनेक प्रकार के पकवान परोसे | सब लोग कहने लगे पार्वती के सब प्रकार का आनन्द हैं यह तो अपने भाग्य से राज्य कर रही हैं | शिवजी ने रसोई की सभी खाद्य सामग्री समाप्त कर दिये | पार्वती जी ने सब्जी खाकर पानी पी लिया और अपने पति के साथ अपने घर की और चल पड़ीं | इसके बाद जो दूब सुख गई थी वह हरी हो गई | शिवजी ने सोचा की पार्वती का दोष मिट गया |

उसी नगरी में आये जहा रानी के पुत्र होने वाला था | रानी  में थी वहा रानी कुआँ पूजने जा रही थी सब लोग नाच रहे थे | रानी को देख पार्वती ने कहा स्वामी मेरी कोख खोल दो | शिवजी बोले अब कैसे खोलू ? आगे चले घोड़ी अपने बच्चे को दुलार रही थी | घोड़ी को देख पार्वती ने हट पकड़ ली की मेरी कोख खोल दो नहीं तो मैं इसी जगह अपने प्राण त्याग दूंगी | पार्वती जी का हट देखकर शिवजी ने पार्वती ने उबटन से गणेश बनाया | पार्वती जी ने बहुत से नेकाचार किये और कुआँ पूजा |

पार्वती जी बोली कि मैं सुहाग बाटूंगी तो सब तरफ शोर मच गया कि पार्वती जी सुहाग बाँट रही हैं | जिसको लेना हैं ले लो | सब दौड़ – दौड़कर सुहाग ले गई | इस प्रकारकिसी को भी पार्वती जी ने निराश नहीं लौटाया | इस व्रत का उद्यापन कर दे | इससे अखंड सौभाग्य , सभी मनोकामनाये पूर्ण हो जाती हैं |