निर्जला एकादशी व्रत कथा | Nirjala Ekadashi Vart Katha

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निर्जला एकादशी व्रत कथा

Nirjala Ekadashi Vart Katha

ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का उपवास किया जाता हैं | इस व्रत में पानी पीना भी वर्जित होता हैं इसलिये इस व्रत को निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता हैं | इस दिन मीठा शक्कर युक्त जल से भरा कलश मन्दिर में चढ़ाना व किसी ब्राह्मण को दान करना शुभ माना जाता हैं |

भीम सेन बोले – हे पितामह ! मेरी अरदास सुनो | युधिष्ठिर , कुंती , द्रोपदी , अर्जुन , नकुल , सहदेव ये सभी एकादशी को उपवास करते हैं  | वे मुझसे प्रत्येक एकादशी पर कहते हैं की भीमसेन ! तुम एकादशी का उपवास किया करो , मैं उनसे कहता हूँ की हे भ्राता ! मुझसे भूख सहन नहीं होती | मैं ब्राह्मणों को दान करूंगा , भगवान श्री कृष्ण का पूजन करूंगा | बिना उपवास किये एकादशी के व्रत का फल कैसे मिले ? भीमसेन का यह वचन सुनकर व्यास जी बोले – भीमसेन तुम्हे स्वर्ग अत्यंत प्रिय हैं | वैसे तो दोनों पक्षों को एकादशी का व्रत करना आवश्यक हैं | भीमसेन बोले –  पितामह !  मैं आपसे कहता हूँ एक बार भोजन करने से मैं नहीं रह सकता फिर उपवास कैसे करूंगा | हे महामुने ! वृक नामक अग्नि सदैव मेरे पेट में रहती हैं | जब में बहुत सा अन्न खाऊं तब शांत होती हैं | हे महामुने ! मैं वर्ष में एक उपवास कर सकता हूँ जिससे स्वर्ग मिल जाये | उस एक व्रत को मैं विधिपूर्वक करूंगा , इसलिये निश्चय करके विशेष फल दाई एकादशी उपवास के बारे में बताने की कृपा करे |जिससे मेरा कल्याण हो |

व्यासजी बोले ! हे नराधिप ! तुमने मानव मानव धर्म व वैदिक धर्म सुने पर कलयुग में उन धर्मो को करने का सामर्थ्य मनुष्य में नहीं हैं | सरल उपाय , थौड़ा धन , कम परिश्रम से महाफल प्राप्त होने की विधि मैं तुमसे कहता हूँ जों की सब पुराणों का सार हैं | ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी व्रत जों विधि विधान से पूरी श्रद्धा से करता हैं उसका कल्याण निश्चित हैं | माशे भर सुवर्ण का दान जिसमें दूब जाये उतना ही जल आचमन के लिए कहा गया हैं | वही शरीर को पवित्र करने वाला हैं | गौ के कण के समान हाथ करके माशे भर जल पीना चाहिए | उससे न अधिक न कम | एकादशी के सूर्योदय से द्वाद्शी के सूर्योदय तक अन्न जल का सेवन न करे | ऐसा करने से बारह महीने की एकादशी का फल व्रती को बिना प्रयास के ही मिल जाता हैं | द्वाद्शी के दिन ब्राह्मण भोज करवा कर  यथा शक्ति  दान करे | फिर व्रती परिवार सहित स्वयं भोजन करे |

भीमसेन इस प्रकार विधि विधान से जों उपवास करता हैं उसका पुण्य सुनों | वर्ष भर में जितनी एकादशी होती हैं उन सब के बराबर फल निर्जला एकादशी उपवास से मिल जाता हैं | इसमें संदेह नहीं हैं | शंख चक्र गदाधारी भगवान श्री कृष्ण ने मुझसे कहा हैं मेरी शरण में आवों तुम्हारा कल्याण होगा |निर्जला एकादशी को निराहार रहने से मनुष्य सब पापों से छुट जाता हैं |  सब तीर्थो में जों पुण्य होता हैं और सब दान करने से जों फल मिलता हैं , हे वृकोदर ! वही फल निर्जला एकादशी के व्रत से मिल जाता हैं | निर्जला एकादशी के व्रत के प्रभाव से बड़े शरीर वाले भयंकर काले पीले रंग के दंड पाशधारी यम के दूत उसके पास नहीं आते | व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु के दूत लेने आते हैं |अंत समय में उस मनुष्य को पालकी में बैठाकर विष्णु लोक में ले जाते हैं | इसलिये यत्न पूर्वक श्रद्धा व भक्ति से निर्जला एकादशी व्रत करना चाहिए | फिर जल दान से और गौ दान करने से मनुष्य सब पापों से छुट जाता हैं |

हे जनमेजय ! निर्जला एकादशी के महात्म्य को सुनकर पांडवों ने यह व्रत किया | उसी दिन से भीमसेन ने निर्जला एकादशी का उपवास किया | तभी से इनका नाम भीमसेन एकादशी हो गया  | हे भूपाल ! इस प्रकार सब पापों को दुर करने के लिए तुम भी यत्नपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत और भगवान का पूजन करो |

हे अनन्त ! हे देवेश ! मैं आज आपका निर्जल उपवास करूंगा और दुसरे दिन सूर्योदय के पश्चात ब्राह्मण भोजन यथा शक्ति दान दक्षिणा के बाद परिवार सहित भोजन करूंगा यह संकल्प कर व्रत आरम्भ करे | स्त्री अथवा पुरुष का सुमेरु या मन्दराचल पर्वत के समान भी पाप हो तो भी निर्जला एकादशी के प्रभाव से भस्म हो जाता हैं |

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हे नराधिप ! जल दान और गौदान न कर सके तो कलश के वस्त्र लपेटकर सुवर्ण का दान करे | जों कोई उसमें जल दान का नियम करता हैं उसको एक प्रहर में करौड पल सुवर्ण दान का फल मिलता हैं | निर्जला एकादशी के दिन स्नान , दान .जप , तप , होम जों कुछ दान पुण्य मनुष्य करता हैं वे सब अक्षय हो जाते हैं उनका कभी क्षय नहीं होता | यह भगवान कृष्ण ने कहा हैं |

हे राजन ! जिसने निर्जला एकादशी का विधिपूर्वक उपवास किया हैं , उसको और धर्म से क्या प्रयोजन हैं | व्रत करने वाला विष्णु लोक को जाता हैं | हे कुरुश्रेष्ठ ! जों एकादशी के दिन अन्न खाता हैं वह पाप का भागी होता हैं | इस लोक में वह चांडाल होकर मरने के बाद बुरी गति होती हैं |जों ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में निर्जला एकादशी का विधिपूर्वक उपवास करेंगे वे परम् पद को प्राप्त होंगे | जिस स्त्री या पुरुष ने निर्जला एकादशी का व्रत किया हैं वे सभी पापों से मुक्त हो उत्तम पद प्राप्त करते हैं |

हे कौन्तेय ! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धा और नियम से युक्त स्त्री और पुरुष का जों विशेष कर्तव्य हैं उसे सुनों !भगवान विष्णु का , शिव का पूजन करे , घृत धेनु का दान करे | हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ ! अनेक तरह के मिष्ठान और वस्त्र आभुष्ण देकर ब्राह्मणों को प्रसन्न करे | ब्राह्मणों के प्रसन्न होने से मोक्ष देने वाले भगवान प्रसन्न होते हैं | जिसने निर्जला एकादशी का व्रत नहीं किया उन मनुष्यों ने आत्मा से द्रोह किया हैं | वे पापी , दुराचारी और दुष्ट हैं और नि: संदेह उनके सैकड़ो कुलो का उद्धार नहीं हुआ | जिन मनुष्यों ने श्रद्धा व भक्ति से भगवान का पूजन किया हैं , उन्होंने अपने समेत सौ पीढ़ी के पूर्वजो को विष्णु लोक में परम् पद प्राप्त करते हैं |

जों कोई निर्जला एकादशी के दिन रात्रि जागरण करते हैं और अन्न , मीठा जल कलश , शय्या दान करने से भी श्री हरी के चरणों में स्थान मिलता हैं |

इस प्रकार विधि सहित पवित्र पावनी निर्जला एकादशी का उपवास करता हैं उसकी सभी मनोकामनाये पूर्ण हो अंत में परम् पद प्राप्त होता हैं |

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