सावित्री माता की कथा , व्रत विधि | Savitri Mata Ki Katha ,Vart Vidhi

By | March 6, 2018

प्राचीन काल में एक सत्यवादी प्रजापालन में व्यस्त अश्वपति नाम का राजा राज्य करता था , उसे कोई सन्तान नहीं थी | इसलिये उसने अपनी पत्नी के साथ मिलकर माँ सावित्रीं की कठोर पूजा व आराधना की ,आराधना से प्रसन्न हो माँ सावित्री ने राजा को वर दिया की राजन ! तुम्हे मेरे ही अंश से एक सुन्दर गुणवान कन्या उत्पन्न होगी |’ इतना कहकर अंतर्ध्यान हो गई और नवे महीने माँ सावित्री की कृपा से एक सुंदर कन्या उत्पन्न हुई | माँ सावित्री की कृपा से उत्पन्न होने के कारण उस कन्या का नाम सावित्री रखा | धीरे – धीरे वह विवाह योग्य हो गई | सावित्री ने गुरु की आज्ञा से सावित्री व्रत किया | एक दिन पिता की दृष्टि सावित्री पर पड़ी और उसे विवाहयोग्य जानकर अमात्यो से उसके विवाह के विषय में मन्त्रणा की और अपनी पुत्री को आज्ञा दी की पुत्री ! तुम अमात्यो के साथ जाकर स्वयं अपनी इच्छा अनुसार कोई श्रेष्ठ वर चुन लो | सावित्री भी पिता की आज्ञा से मंत्रियों व अमात्यो के साथ चल पड़ी | कुछ समय में ही कई राज्यों , आश्रमों ,गुरु जनों से आशीर्वाद लेकर अपने पिता के पास लौट आई | सावत्री ने देखा पिता के पास देवर्षि नारद बैठे हुए हैं | देवर्षि नारद व पिता को प्रणाम कर बताया की शाल्व देश में घुमत्सेन नाम के राजा हैं | उनके सत्यवान नाम का पुत्र को मेंने चुना हैं | सावित्री की बात सुन देवर्षि नारद ने कहा वहाँ सब सुख़ हैं पर सत्यवान अल्पायु हैं | सब ने सावित्री को समझाया पर सावित्री ने कहा मैंने मन से सत्यवान को पति रूप में चुन लिया हैं , जों वचन लिया हैं वही करना चाहिए , और में वही करूंगी |  सावित्री का दृढ निश्चय देखकर सावित्री का विवाह शुभ मुहूर्त में सत्यवान के साथ कर दिया | सावित्री अत्यधिक प्रसन्न हुई | दोनों आश्रम में सुख़ पूर्वक रहने लगे पर सावित्री के मन में नारद जी की बात खटकती थी | अपने पति की मृत्यु का समय निकट जानकर सावित्री ने भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वाद्शी तिथि से तिन रात्रि का व्रत ग्रहण कर लिया और वह भगवती सावित्री का जप , तप , ध्यान , पूजन करती रही | माँ सावित्री से मन ही मन अखंड सोभाग्यवती का आशीर्वाद मांगती रही, और सावित्री ने तीन दिन विधि विधान से पजा समनं कर पितरो का तर्पण कर अपने सास – ससुर के चरणों में प्रणाम किया |

सत्यवान जंगल से लकड़ी लाय करता था , सावित्री ने भी साथ जाने की इच्छा जताई | सत्यवान  ने कहा सास ससुर  की आज्ञा ले लो  | जब सास ससुर की आज्ञा लेने गई तो पहले तो सास ससुर ने मना किया पर फिर मान गये | दोनों साथ साथ वन में गये | सत्यवान ने लकड़ी काट कर गठर बनाया उसी समय उसके सिर में भयंकर दर्द हुआ | उसने सावित्री से कहा – ‘ प्रिये !  मेरे सिर में दर्द हैं सावत्री ने अपने पति का सिर गोद में रखा और आराम करने को कहा | उसी समय यमराज वहाँ आ गये | सावित्री ने उन्हें प्रणाम किया और कहा – प्रभु ! आप कौन हैं ? मेरे पास क्यों आये हैं ?

यमराज जी कहा – सावित्री ! मेरा नाम यमराज हैं | तुम्हारे पति कि आयु समाप्त हो गई ,परन्तु तुम पतिव्रता हो , इसलिये मेरे दूत इसको न ले जा सके अत: मैं स्वयं लेने आया हूँ | इतना कहकर यमराज के शरीर से अगुष्ठ मात्र के पुरुष को खीच लिया और उसे लेकर अपने लोक को चल पड़े | सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ी | बहुत दुर जाकर यमराज ने सावित्री को जाने को कहा पर वह नहीं मानी और बोली मुझे कोई कष्ट नहीं हो रहा मैं सुखपूर्वक चली आ रही हूँ | जिस प्रकार सज्जनों की गति संत हैं , वर्णाश्रमो का आधार वेद , शिष्यों का आधार गुरु और सभी लोगो का आश्रय स्थान पृथ्वी हैं उसी प्रकार स्त्री का सहारा केवल एक मात्र उसका पति हैं अन्य कोई नहीं | ‘

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इस प्रकार सावित्री के वचनों को सुनकर यमराज प्रसन्न होकर कहने लगे ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ कोई वर मांगो लो |’ तब सावित्री ने विनय पूर्वक वर माँगा – मेरे ससुर के नेत्र अच्छे हो जाय उन्हें राज्य मिले , मेरे सौ पुत्र हो , मेरे पति दीर्घायु हो , हमारी सदा धर्म में श्रद्धा बनी रहे | यमराज ने ततास्तु कहा और सत्यवान को सावित्री को दे दिया | अत्यधिक प्रसन्ता से सावित्री और सत्यवान आश्रम आ गये यह सावित्री माता के व्रत का ही फल हैं | और दीर्घकाल तक सांसारिक सुख़ प्राप्त किया |

सावित्री माता व्रत विधि

अखंड सौभाग्य की इच्छा रखने वाली महिलाये भाद्र पद मास के शुक्ल पक्ष की द्वाद्शी को पवित्र होकर तीन दिन के लिए सावित्री व्रत का संकल्प ले , नदी या तालाब या घर पर पानी में गंगाजल डालकर नित्य स्नान करे और पूर्णिमा को सरसों का उबटन लगाकर स्नान करे | चांदी की सावित्री माता की मूर्ति बनाकर बाँस की टोकरी में लाल रंग के वस्त्र पहना कर स्थापित करे | फिर लाल फूल , रोली , मोली ,चन्दन , नारियल ,फल , कच्चे सूत के तार , से पूजा करे और माँ को समर्पित कर दे तत्पश्चात रात्रि में जागरण कर माँ के भजन गाये , सावत्री माता की कथा सुने | सावित्री माता की मूर्ति ,  पूजा का सामान किसी ब्राह्मण को दान कर दे और स्वयं भोजन करे |

इस व्रत को विधि विधान से जों स्त्रियाँ माँ सावत्री का व्रत करती हैं वे पुत्र , पोत्र , धन सम्पूर्ण सुख़ भोगकर पति के साथ ब्रह्म लोक में स्थान प्राप्त करती हैं |

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