आरती सरस्वती जी | AARTI MAA SARSWATI JI KI

सरस्वती का श्री विग्रह शुक्ल वर्ण हैं | ये परम् सुन्दरी देवी सदा हंसती रहती हैं | इनके एक हाथ में वीणा हैं और दुसरे में पुस्तक | जों भगवती सरस्वती को अपना इष्ट मानते हैं , उनके लिये यह नित्य क्रिया हैं|

‘श्रीं हीं सरस्वत्यै स्वाहा ‘ 

ये वैदिक अष्टाक्षर मूल मन्त्र परम् श्रेष्ट एवं सबके लिए उपयोगी हैं |इस मन्त्र को कल्पवृक्ष कहते हैं | 

माँ सरस्वती जी की आरती के पश्चात एक सौ आठ जप  इस मन्त्र की करने से विद्यार्थियों को सफलता प्राप्त होती हैं |

आरती सरस्वती जी की

जय सरस्वती माता , मैया जय सरस्वती माता |

सद्गुण वैभव शालिनी , त्रिभुवन विख्याता ||

मैया जय …….

चन्द्र्वद्ती पद्मासिनी ,  घुती  मंगलकारी |

सोहे शुभ हंस सवारी , अतुल तेजधारी ||

मैया जय ….

बाए कर में वीणा , दाये कर माला |

सीस मुकुट मणि सोहे , गल मोतियन माला ||

मैया जय ….

देवी शरण जों आये , जाका उद्दार किया |

पैठी मंथरा दासी , रावण संहार किया ||

मैया जय ….

विद्या ,ज्ञान प्रदायनी ज्ञान प्रकाश भरो |

मोह , अज्ञान , तिमिर का , जग से नाश करों ||

मैया जय ….

धुप दीप फल मेवा , माँ स्वीकार करो |

ज्ञानचक्षु दे माता , जग निस्तार करो ||

मैया जय ….

माँ सरस्वती की आरती , जों कोई नर गावे |

हितकारी सुखकारी , ज्ञान भक्ति पावे ||

मैया जय …..

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