सोमवार व्रत कथा

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Last updated on November 19th, 2017 at 10:55 am

एक नगर में बहुत धनवान साहूकार रहता था | उसके घर में धन की कोई कमी न थी , परन्तु वह बहुत दुखी रहता था , क्यों की उसके कोई पुत्र नही था | वह इसी चिंता में दिन रात दुखी रहता था | पुत्र की कामना के लिए वह प्रत्येक सोमवार शिवजी का व्रत ,पुजन एवं कीर्तन किया करता हैं | तथा सायंकाल मन्दिर जाकर शिवजी के सामने दीपक जलाया करता था |

उसके इसी भक्ति – भाव को देखकर एक समय माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा –  “ प्रभु यह साहूकार आपका अनन्य भक्त हैं , सदैव आपका पूजन एवं व्रत बड़ी श्रद्दा से करता हैं | आपको इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिये | “

शिवजी ने कहा – हे पार्वती ! यह संसार कर्म क्षेत्र हैं | किसान खेत में जैसा बीज बोटा हैं वैसी ही फसल काटता हैं |उसी तरह मनुष्य इस संसार में जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल भोगते हैं | माता पार्वती ने अत्यंत आग्रह से कहा — “ प्रभु ! जब यह आपका अनन्य भक्त हैं और उसको किसी प्रकार का कोई दुःख हैं तो उसे आपको अवश्य दुर करना चाहिये | आप तो सदैव अपने भक्तो पर दयालु होते हैं और उनके दुखो को दुर करते हैं | यदि आप ऐसा करेगें तो मनुष्य आपका पूजन तथा व्रत क्यों करेगें ? “

माता पार्वती का ऐसा आग्रह देख शिवजी बोले –“ हे पार्वती ! इसको कोई पुत्र नहीं हैं , इसी चिंता में यह अत्यन्त दुखी रहता हैं | इसके भग्य में पुत्र न होने पर भी मैं इसको पुत्र प्राप्ति का वर देता हूँ | परन्तु वह पुत्र केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा | इसके पश्चात वह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा | इससे अधिक मैं इसके लिए कुछ नही कर सकता |

माता पार्वती और भगवान शिव का वार्तालाप साहूकार ने सुन रहा था |इससे उसको न तो प्रसन्नता हुई और न ही दुःख हुआ | वह पूर्व की तरह शिवजी का व्रत और पूजन करता रहा |

कुछ समय बाद साहूकारकी स्त्री गर्भवती हुई और दसवे महीने उसने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया | साहूकार के घर में बहुत ख़ुशी मनाई गई | परन्तु साहूकार तो यह जानता था कि उसकी केवल बढ़ वर्ष की आयु हैं , इसलिये उसने न तो प्रसन्नता प्रकट की और न ही किसी को यह  भेद बताया |

जब वह बालक 11 वर्ष का हो गया तो बालक कि माता ने उसके पिता को उसका विवाह करने के लिये कहा | तब साहूकार ने कहा मैं “ अभी इसका विवाह नही करूंगा अभी मैं इसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए कांशी पढने के लिए भेजूंगा | “ साहूकार ने बालक के मामा को बुलाकर बहुत सा धन देकर कहा – “ तू इस बालक कोकाशी पढने के लिए ले आओ और रास्ते में जिस  स्थान पर भी जावों हवन तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते तथा दक्षिणा देते जाना |”

दोनों मामा भांजे हवन भजन कीर्तन करते हुए ब्राह्मणों को भोजन कराते तथा दक्षिणा देते हुए काशी नगरी की और चल पड़े | रास्ते में उनको एक शहर पड़ा | उस शहर के राजा की कन्या का विवाह था | परन्तु जों राजकुमार विवाह करने के लिए आया वह एक आँख से काना था | उसके पिता को इस बात की बहुत चिंता थी कि कही राजकुमारी मना न कर दे | जब उसने सेठ के अति सुन्दर लडके को देखा तो मन में विचार किया की मैं इस लडके से वर का काम चलाया जाये |  ऐसा मन में विचार कर राजकुमार के पिता ने लडके के मामा से बात की और कहा की  इसके बदले में आपको बहुत सारा धन दूंगा वे मान गये | विवाह कार्य अच्छे से सम्पन्न हो गया | सेठ का पुत्र जिस समय जाने लगा तो उसने राजकुमारी की चुन्दडी के पल्ले पर लिख दिया — “ तेरा विवाह मेरे साथ हुआ हैं पर जिस राजकुमार के साथ तुम्हे भेजेंगे वह एक आंख से काना हैं | “ मैं काशी पड़ने जा रहा हूँ |सेठ के लडके के जाने के पश्चात राजकुमारी ने जब अपनी चुन्दडी पर ऐसा लिखा हुआ पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया | उसने अपने माता पिता को सारी बात बताई | राजकुमारी के माता पिता ने राजकुमारी को विदा   नहीं किया और बारात वापस चली गई |

सेठ का लड़का तथा उसका मामा काशी जी पहुच गये | वहाँ जाकर उन्होंने यज्ञकरना और लडके को पढ़ाना शुरू कर दिया | जिस दिन लडके की आयु 12 वर्ष की हुई उसी दिन उनके यज्ञ की पूर्णाहुति थी |लडके ने मामा से कहा – “ मामाजी आज मेरी तबियत ठीक नही लग रही हैं | “ मामा ने कहा – ‘ अंदर जाकर सो जावों | ’ लड़का अंदर जाकर सो गया और थोड़ी ही देर में उदके प्राण निकल गये | कुछ समय पश्चात उसके मामा ने आकर देखा तो उनका भानजा मृत पड़ा , मामा ने अपने आपको सम्भाला और यज्ञ कार्य सम्पन कर ब्राह्मणों को भोज करवाकर , दक्षिणा देकर विदा किया ,अपने आप को रोक न पाया और जोर जोर से रोने लगा |

संयोग वश उसी समय शिव पार्वती उधर से जा रहे थे | तब उन्होंने जोर जोर से रोने की आवाज सुनी तो माँ पार्वती कहने लगी स्वामी कोई दुखियारा आपको पुकार रहा हैं ,आपको इसकी सहायता करनी चाहिए |माँ पार्वती और शिवजी वहाँ गए तो देखा की वहाँ एक लड़का  मृत पड़ा हैं |माता पार्वती कहने लगी स्वामी यह तो वही लड़का हैं जों आपके वरदान से उत्पन हुआ हैं | ‘ “ शिवजी ने कहाँ – ‘ हे पार्वती ! इसकी आयु इतनी ही हैं और यह भोग चूका हैं |’ पर कोमल मन माँ पर्वती ने कहाँ स्वामी इसको जीवन दान दो नही तो इसके माता पिता तडप तडप कर मर जायेगे | माता पार्वती के बार – बार आग्रह करने पर शिवजी भगवान ने उसको जीवन दान दे दिया | शिवजी की कृपा से लड़का जीवित हो गया उसके मामा अत्यधिक प्रसन्न हो गये | शिवजी और माँ पार्वती कैलाश पर चले गये |

शिक्षा पूर्ण होने पर उसके मामा और भानजा यज्ञ करते हुए , ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए , दक्षिणा देते हुए अपने घर की और चल पड़े | रास्ते में उसी शहर में आये जहाँ उस लडके का विवाह राजकुमारी से हुआ था | वहाँ आकर उसने यज्ञ प्रारम्भ कर दिया | वहाँ के राजा ने उसको पहचान लिया और महल ले जाकर बहुत आव भगत की |

बहुत से दास – दसियों सहित अपनी राजकुमारी को जमाई [ लडके ]  के साथ विडा कर दिया |जब वे अपने शहर के निकट आये तो मामा ने कहा कि मैं घर पर जाकर सुचना कर आता हूँ |उसके पिता शिवजी के मन्दिर में बैठे थे उन्होंने संकल्प कर रखा था की यदि मेरा पुत्र मृत आया तो मैं शिवजी के चरणों में अपना सिर पटक – पटक कर प्राण त्याग दूंगा | लडके के मामा ने आकर यह समाचार दिया की आपका पुत्र आ गया हैं ,अपनी पत्नी को साथ लेकर  , बहुत सा धन लेकर आया हैं |तो सेठ प्रसन्ता से भर उठा और बार बार भगवान का धन्यवाद किया |

सेठ और सेठानी ने आनन्द पूर्वक पुत्र और पुत्रवधू का स्वागत किया | सभी बड़ी प्रसन्ता से साथ रहने लगे | तथा सारी नगरी में कहलवा दिया की इस व्रत को करने से विवाह योग्य कन्या को उत्तम वर , उत्तम गुण , रूप सौन्दर्य तथा स्त्रियों को अनेक गुण वाली सन्तान , सुवर्ण , वस्त्र ,और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती हैं | तथा पति पत्नी का कभी वियोग नहीं होता तथा अंत में शिव लोक में निवास करते हैं | यह व्रत एश्वर्य को प्रदान करने वाला हैं | जिस घर के स्त्री पुरुष इस व्रत को करते हैं उस घर में हमेशा भगवान शंकर तथा माँ पार्वती की कृपा रहती हैं |

|| जय बोलो भोले नाथ की जय ||       || माँ पार्वती की जय ||