श्रीमहाभारत वनपर्व के अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्व में क्षत्रियमाहात्म्य के प्रकरण में शिबिचरित्रविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय ll Representation of Shibiki importance by Varshi naradd

surdarshan chakra ki katha

अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन

वैशम्पायन उवाच

 

भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यव्रवीत् पाण्डवो मार्कण्डेयम् । अथाचष्ट मार्कण्डेयः । अष्टकम्य वैश्वामित्रेरश्वमेधे सर्वे राजानः प्रागच्छन् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः प्रार्थना की- ‘मुने ! क्षत्रिय नरेशोंके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये ।’ तब मार्कण्डेयजी ने कहा- ‘धर्मराज ! विश्वामित्रके पुत्र अष्टकके अश्वमेधयज्ञमें सब राजा पधारे थे ॥ १ ॥

भ्रातरश्चास्य प्रतर्दनो वसुमनाः शिविरौशीनर इति । स च समाप्तयज्ञो भ्रातृभिः सह रथेन प्रायात् । ते च नारदमागच्छन्तमभिवाद्यारोहतु भवान् रथमित्यब्रुवन् ॥ २ ॥

‘अष्टकके तीन भाई प्रतर्दन, वसुमना तथा उशीनर पुत्र शिबि भी उस यज्ञमें आये थे। यज्ञ समाप्त होनेपर एक दिन अष्टक अपने भाइयोंके साथ रथपर आरूढ़ हो (स्वर्गकी ओर ) जा रहे थे। इसी समय रास्तेमें देवर्षि नारदजी आते दिखायी दिये। तब उन तीनोंने उन्हें प्रणाम करके कहा- भगवन् आप भी रथपर आ जाइये ॥ २ ॥

तांस्तथेत्युक्त्वा रथमारुरोह । अथ तेषामेकः सुरर्षि नारदमब्रवीत् । प्रसाद्य भगवन्तं किचि दिच्छेयं प्रष्टुमिति ॥ ३ ॥

‘तब नारदजी ‘तथास्तु’ कहकर उस रथपर बैठ गये। तदनन्तर उनमें से एकने देवर्षि नारदसे कहा – ‘भगवन् ! मैं आपको प्रसन्न करके कुछ पूछना चाहता हूँ’ ॥ ३ ॥

पृच्छेत्यव्रवीदृषिः । सोऽब्रवीदायुष्मन्तः सर्व गुणप्रमुदिताः । अथायुष्मन्तं स्वर्गस्थानं चतुर्भि र्यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् । अयमष्टको ऽवतरे दित्यव्रवीदृषिः ॥ ४ ॥

‘देवर्षिने कहा–‘पूछो’ तब उसने इस प्रकार कहा ‘भगवन् ! हम सब लोग दीर्घायु तथा सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण सदा प्रसन्न रहते हैं। हम चारोंको दीर्घकालतक उपभोगमें आनेवाले स्वर्गलोक में जाना है, किंतु वहाँसे सर्व प्रथम कौन इस भूतलपर उतर आयेगा ?’ देवर्षिने कहा- ‘सबसे पहले अष्टक उतरेगा’ ॥ ४ ॥

कि कारणमित्यपृच्छत् । अथाचष्ट्राष्टकस्य गृहे मया उषितं स मां रथेनानुप्रावहदथापश्यमनेकानि गोसहस्राणि वर्णशो विविक्तानि तमहमपृच्छं कस्येमा गाव इति सोऽब्रवीत् । मया निसृष्टा इत्येतास्तेनैव स्वयं लाघति कथितेन । एषोऽवतरेदश त्रिभिर्यातव्यं साम्प्रतं कोऽवतरेत् ॥

“फिर उसने पूछा- “क्या कारण है कि अष्टक ही उतरेगा ?” तब नारदजीने कहा- ‘एक दिन मैं अष्टकके घर ही ठहरा था। उस दिन अष्टक मुझे रथपर बिठाकर भ्रमणके लिये ले जा रहे थे। मैंने रास्ते में देखा, भिन्न-भिन्न रंगकी कई हजार गौएँ पृथक्-पृथक् चर रही हैं। उन्हें देखकर मैंने अष्टकसे पूछा – ‘ये किसकी गौएँ हैं?’ इन्होंने उत्तर दिया ‘ये मेरी दान की हुई गौएँ हैं। इस प्रकार ये स्वयं अपने किये हुए दानका बखान करके आत्मश्लाघा करते हैं। इसी लिये इन्हें स्वर्गसे पहले उतरना पड़ेगा।” तत्पश्चात् उन लोगोंने पुनः प्रश्न किया— “यदि हम शेष तीनों भाई स्वर्ग में जायँ, तो सबसे पहले किसको उतरना पड़ेगा ११ ।। ५ ।।

 

 

प्रतर्दन इत्यब्रवीदृषिः । तत्र किं कारणं प्रत र्दनस्यापि गृहे मयोषितं स मां रथेनानुप्रावहत् ॥ ६॥

अथैनं ब्राह्मणोऽभिक्षेताश्वं मे ददातु भवान् निवृत्तो दास्यामीत्यब्रवीद् ब्राह्मणं त्वरितमेव दीयता मित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्त्वरितमेव स ब्राह्मणस्यैवमुक्त्वा दक्षिणं पार्वमददत् ॥ ७ ॥

‘देवर्षिने उत्तर दिया- ‘प्रतर्दनको ।’ ‘इसमें क्या कारण है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर देवर्षिने उत्तर दिया- ‘एक दिन मैं प्रतर्दनके घर भी ठहरा था। ये मुझे रथसे ले जा रहे थे। उस समय एक ब्राह्मणने आकर इनसे याचना की- ‘आप मुझे एक अश्व दे दीजिये।’ तब उन्होंने ब्राह्मणको उत्तर दिया ‘लौटनेपर दे दूँगा।’ ब्राह्मणने कहा- ‘नहीं, तुरंत दे दीजिये।’ ‘अच्छा तो तुरंत ही लीजिये’ यों कहकर इन्होंने रथके दाहिने पार्श्वका घोड़ा खोलकर उसे दे दिया’ ।। ६-७ ।।

 

 

अथान्योऽप्यश्चार्थी ब्राह्मण आगच्छत् । तथैव चैनमुक्त्वा वामपाणिमभ्यदादथ प्रायात् पुनरपि चान्योऽध्यभ्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् त्वरितोऽथ तस्मै अपना वामं धुर्यमददत् ॥ ८ ॥

‘इतनेहीमें एक दूसरा ब्राह्मण आया। उसे भी घोड़ेकी ही आवश्यकता थी । जब उसने याचना की, तब राजाने पूर्ववत् उससे भी यही कहा—’लौटनेपर दूँगा ।’ परंतु उसके आग्रह करनेपर उन्होंने रथके वाम पार्श्वका एक घोड़ा दिया। फिर वे आगे बढ़ गये। तदनन्तर एक घोड़ा माँगनेवाला दूसरा ब्राह्मण आया। उसने भी जल्दी ही माँगा। तब राजाने उसे बायें धुरेका बोझ ढोनेवाला अश्व खोल करके दे दिया ||

अथ प्रायात् पुनरन्य आगच्छदश्वार्थी ब्राह्मण स्तमब्रवीदतियातो दास्यामि त्वरितमेव मे दीयतामित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्तस्मै दत्त्वाइवं रथधुरं गृह्णता व्याहृतं ब्राह्मणानां साम्प्रतं नास्ति किंचिदिति ॥

‘तत्पश्चात् जब वे आगे बढ़े, तब फिर एक अश्वका इच्छुक ब्राह्मण आ पहुँचा। उसके माँगनेपर राजाने कहा- ‘मैं शीघ्र ही अपने लक्ष्यतक पहुँचकर घोड़ा दे दूँगा ।’ ब्राह्मण बोला ‘मुझे तुरंत दीजिये ।’ तब उन्होंने ब्राह्मणको अश्व देकर स्वयं रथका धुरा पकड़ लिया और कहा–’ब्राह्मणोंके लिये ऐसा करना सर्वथा उचित नहीं है ॥ ९ ॥

य एष ददाति चासूयति च तेन व्याहतेन तथावतरेत् । अथ द्वाभ्यां यातव्यमिति कोऽव तरेत् ।। १० ।।

‘ये प्रतर्दन दान देते हैं और ब्राह्मणकी निन्दा भी करते हैं, अतः वह निन्दायुक्त वचन बोलनेके कारण पहले इन्हींको स्वर्गसे उतरना पड़ेगा। तब पुनः प्रश्न किया गया, ‘हम शेष दो भाई जा रहे हैं, उनमें से कौन पहले स्वर्गसे नीचे उतरेगा ?”

वसुममा अवतरेदित्यब्रवीदृषिः ॥ ११ ॥

‘देवर्षिने उत्तर दिया- ‘वसुमना पहले उतरेंगे’ ॥ ११॥ किं कारणमित्यपृच्छदथाचष्ट नारदः । अहं परिभ्रमन् वसुमनसो गृहमुपस्थितः ॥ १२ ॥

“तब उन्होंने पूछा- “इसका क्या कारण है ?’ नारदजी बोले – “एक दिन मैं घूमता-घामता वसुमना के घर पर जा पहुँचा 

स्वतिवचनमासीत् पुष्परथस्य प्रयोजनेन समहमन्वगच्छं स्वस्तिवाचितेषु ब्राह्मणेषु रथो ब्राह्मणानां दर्शितः ॥ १३ ॥

‘उस दिन उनके यहाँ स्वस्तिवाचन हो रहा था। राजाके यहाँ एक ऐसा रथ था, जो पर्वत, आकाश और समुद्र आदि दुर्गम स्थानोंपर भी सुगमतासे आ-जा सकता था । उसका नाम था ‘पुष्परथ’। मैं उसीके प्रयोजनसे राजाके यहाँ गया था। जब ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचन कर चुके, तब राजाने ब्राह्मणोंको अपना वह रथ दिखाया ॥ १३ ॥

 

 

तमहं रथं प्राशंसमथ राजाब्रवीद् भगवता रथः प्रशस्तः । एष भगवतो रथ इति ॥ १४ ॥

‘उस समय मैंने उस रथकी बड़ी प्रशंसा की। राजा बोले–भगवन् ! आपने इस रथकी प्रशंसा की है। अतः यह रथ आपहीका है’ ॥ १४ ॥

अथ कदाचित् पुनरप्यहमुपस्थितः पुनरेव च रथप्रयोजनमासीत् । सम्यगयमेष भगवत इत्येवं राजाब्रवीदिति पुनरेव तृतीयं स्वस्तिवाचनं समभावयमथ राजा ब्राह्मणानां दर्शयन् मामभिप्रेक्ष्याब्रवीत् । अथो भगवता पुष्परथस्य खस्ति वाचनानि सुष्टु सम्भावितानि एतेन द्रोहवचने नावतरेत् ॥ १५ ॥

‘तदनन्तर एक दिन और मैं राजाके यहाँ उपस्थित हुआ। पुनः मेरे जानेका उद्देश्य पुष्परथको प्राप्त करना ही था । उस दिन भी राजाने बड़ी आवभगतके साथ कहा- “भगवन् ! यह रथ आपका ही है। फिर तीसरी बार मैंने उनके यहाँ जाकर स्वस्तिवाचनका कार्य सम्पन्न किया। राजाने ब्राह्मणोंको उस रथका दर्शन कराते हुए मेरी ओर देखकर कहा ‘भगवन् ! आपने पुष्परथके लिये अच्छे स्वस्तिवाचन किये ।” ( ऐसा कहकर भी उन्होंने रथ नहीं दिया। ) इस ( छल युक्त ) वचनसे वसुमना ही पहले स्वर्गसे पृथ्वीपर उतरेंगे ॥

अथैकेन यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् पुनर्नारद आह शिविर्यायादहमवतरेयमन्त्र किं कारण मित्यब्रवीत् । असावहं शिबिना समो नास्मि यतो ब्राह्मणः कश्चिदेनमब्रवीत् ॥ १६ ॥ 

 शिवे अन्नार्थ्यस्मीति तमब्रवीच्छिविः किं क्रियतामाज्ञापयतु भवानिति ॥ १७ ॥

‘यदि आपके साथ हममेंसे एकमात्र शिबिको ही स्वर्ग लोकमें जाना हो, तो वहाँसे पहले कौन उतरेगा १२ ऐसा प्रश्न होनेपर नारदजीने फिर कहा- शिबि जायेंगे और मैं उतरूँगा।” ‘इसमें क्या कारण है ?’ यह पूछे जानेपर देवर्षि नारदने कहा- मैं राजा शिबिके समान नहीं हूँ, क्योंकि एक दिन एक ब्राह्मणने शिबिसे कहा – ‘शिवे ! मैं भोजन करना चाहता हूँ ।” राजाने पूछा-आपके लिये क्या रसोई बनायी जाय, आज्ञा कीजिये ।। १६-१७ ।।

अथैनं ब्राह्मणोऽब्रवीद् य एष ते पुत्रो बृहनर्भो नाम एष प्रमातव्य इति तमेनं संस्कुरु अनं चोप पादय ततोऽहं प्रतीक्ष्य इति ततः पुत्रं प्रमाध्य संस्कृत्य विधिना साधयित्वा पाध्यामर्पयित्वा शिरसा प्रतिगृह्य ब्राह्मणममृगयत् ॥ १८ ॥

‘तब इनसे ब्राह्मणने कहा- ‘यह जो तुम्हारा पुत्र बृहद्गर्भ है, इसे मार डालो। फिर उसका दाह-संस्कार करो । तत्पश्चात् अन्न तैयार करो और मेरी प्रतीक्षा करो।” तब राजाने पुत्रको मारकर उसका दाह-संस्कार कर दिया और फिर विधि पूर्वक अन्न तैयार करके उसे बटलोई में डालकर (और ढक्कनसे ढककर) अपने सिरपर रख लिया, फिर वे उस ब्राह्मणकी खोज करने लगे ॥ १८ ॥

अथास्य मृगयमाणस्य कश्चिदाचट एष ते ब्राह्मणो नगरं प्रविश्य दहति ते गृहं कोशागारमायुधागारं स्त्र्यनारमश्वशालां हस्तिशालां च क्रुद्ध इति ॥१९॥ खोज करते समय किसी मनुष्यने उनके पास आफर कहा – ‘राजन | आपका ब्राह्मण इधर है। यह नगरमें प्रवेश करके आपके भवन, कोषागार, शस्त्रागार, अन्तःपुर, अश्व शाला और गजशाला सबमें कुपित होकर आग लगा रहा है।”

अथ शिबिस्तथैवाविकृतमुखवर्णो नगरं प्रविश्य ब्राह्मणं तमब्रवीत् सिद्धं भगवन्नन्नमिति ब्राह्मणो न किंचिद् व्याजहार विस्मयादधोमुखश्चासीत् ॥ २० ॥

‘यह सब सुनकर भी राजा शिबिके मुखकी कान्ति पूर्ववत् बनी रही। उसमें तनिक भी विकार न आया। वे नगरमें घुसकर ब्राह्मणसे बोले– ‘भगवन् ! आपका भोजन तैयार है।” ब्राह्मण कुछ न बोला । वह आश्चर्यसे मुँह नीचा किये देखता रहा ll

ततः प्रासादयद् ब्राह्मणं भगवन् भुज्यतामिति । मुहूर्तादुद्धीक्ष्य शिविमन्नवीत् ॥ २१ ॥

“तब राजाने ब्राह्मणको मनाते हुए कहा- भगवन् ! भोजन कर लीजिये। ब्राह्मणने दो घड़ीतक ऊपरकी ओर देखने के पश्चात् शिबिसे कहा- ॥ २१ ॥

त्वमेवैतदशानेति तत्राह तथेति शिविस्तथैवा विमना महित्वा कपालमभ्युजार्य भोक्कुमैच्छत् ॥२२॥

‘तुम्हीं यह सब खा जाओ।’ शिबिंने उसी प्रकार मनको प्रसन्न रखते हुए बहुत अच्छा’ कहकर ब्राह्मणकी आशा स्वीकार की और उनका पूजन करके (सिरपर रखे हुए) ढक्कन को उषाड़कर वह सब खानेकी इच्छा की ॥ २२ ॥

अथास्य ब्राह्मणो हस्तमगृह्णात् । अब्रवी चैनं जितकोषोऽसि न ते किञ्चिदपरित्याज्यं ब्राह्मणायें ब्राह्मणोऽपि तं महाभागं सभाजयत् ॥ २३ ॥

“तब ब्राह्मणने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा ‘राजन् ! तुमने क्रोधको जीत लिया है। तुम्हारे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुम ब्राह्मणके लिये न दे सको। ऐसा कहकर ब्राह्मणने भी उन महाभाग नरेशका समादर किया ॥

स हाद्धीक्षमाणः पुत्रमपश्यदमे तिष्ठन्तं देव कुमारमिव पुण्यगन्धान्वितमलङ्कृतं सर्वे च तमर्थ विधाय ब्राह्मणोऽन्तरधीयत ॥ २४ ॥

‘राजाने जब आँख उठाकर देखा, तब उनका पुत्र आगे खड़ा था। वह देवकुमारकी भाँति दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित था। उसके शरीरसे पवित्र सुगन्ध निकल रही थी। ब्राह्मण देवता सब वस्तुओको पूर्ववत् ठीक करके अन्तर्धान हो गये ॥

तस्य राजर्षेविंधाता तेनैव वेषेण परीक्षार्थमागत

इति तस्मिन्नन्तर्हिते अमात्या राजानमूचुः । किं प्रेप्सुना भवता इदमेवं जानता कृतमिति ॥ २५ ॥ साक्षात् विधाता ब्राह्मणके वेशमें राजर्षि शिविकी परीक्षा लेने आये थे। उनके अन्तर्धान हो जानेपर राजाके मन्त्रियोंने उनसे पूछा–महाराज ! आप क्या चाहते हैं १ जिसके लिये सब बु.छ जानते हुए भी ऐसा दुःसाहसपूर्ण कार्य किया है ११ ।।

शिबिरुवाच

नैवाहमेतद् यशसे ददानि न चार्थहेतोर्न च भोगतृष्णया । पापैरनासेवित एष मार्ग इत्येवमेतत् सकलं करोमि ॥ २६ ॥

शिबि बोले–मैं यशके लिये यह दान नहीं देता। घनके लिये अथवा भोगकी लिप्सासे भी दान नहीं करता । यह धर्मात्माओंका मार्ग है । पापी मनुष्य इसपर नहीं चल सकते। ऐसा समझकर ही मैं यह सब कुछ करता रहता हूँ ॥ २६ ॥

सद्भिः सदाध्यासितं तु प्रशस्तं तस्मात् प्रशस्तं अयंते मतिर्मे । एतन्महाभाग्यवरं शिवेस्तु तस्मादहं वेद यथावदेतत् ॥ २७ ॥

श्रेष्ठ पुरुष सदा जिस मार्गसे चले हैं, वही उत्तम मार्ग है। इसीलिये मेरी बुद्धि सदा उस उत्तम पथका ही आश्रय लेती है। यह है राजा शिबिकी सर्वश्रेष्ठ महिमा, जिसे मैं (अच्छी तरह ) जानता हूँ । इसीलिये इन सब बातोंका यथावत् वर्णन किया है ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि राजन्यमहाभाग्ये शिबिचरिते अष्टनवस्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९८॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्व के अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्व में क्षत्रियमाहात्म्य के प्रकरण में शिबिचरित्रविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥

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