देवउठनी ग्यारस का महातम्य [ कार्तिक शुक्ल पक्ष ] | Devotthn Eakadashi { Kartik Shukal Paksh ]

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देवोत्थान एकादशी [ कार्तिक शुक्ल पक्ष ]

कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी के नाम से जाना जाता हैं | इस एकादशी को देवउठान एकादशी व प्रबोधनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता हैं | दीपावली के बाद यह एकादशी आती हैं | आषाढ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को उठते हैं | इस कारण इस एकादशी को देवउठानी एकादशी कहते हैं | ऐसी मान्यता हैं की इस दिन भगवान विष्णु जो क्षीर सागर में शयन क्र रहे थे वे इसी दिन उठे | भगवान विष्णु के शयन कल के दौरान सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं जो देवोत्थान एकादशी को उठे | यह एकादशी सभी पापों का हरण करने वाली , पूण्य की वृद्धि करने वाला , मोक्ष प्रदान करने वाला हैं | इस एकादशी का व्रत करने से हजार एकादशी के समान फल प्राप्त होता हैं |

भगवान श्री कृष्ण बोले – हे राजन ! कार्तिक शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती हैं उसका जो वर्णन स्रष्टि कर्ता ब्रह्माजी ने नारद जी किया था वही मैं तुम्हे बतलाता हूँ |

नारदजी ने कहा – पिताजी ! जिसमें धर्म – कर्म में प्रवृति कराने वाले भगवान विष्णु उठते हैं उस देव्त्थान एकादशी का महात्म्य बतलाइए |

ब्रह्माजी बोले – हे मुनि श्रेष्ट ! इस एकादशी का महात्म्य पापो का नाश करने वाला , पूण्य की वृद्धि करने वाला , मोक्ष प्रदान करने वाला हैं |समुन्द्र से लेकर सरोवर जितने भी तीर्थ हैं वे सभी अपने महात्म्य की तभी तक गर्जना करते हैं जब तक की कार्तिक मास में भगवान विष्णु की देवोत्थान एकादशी नहीं आ जाती | प्रबोधनी एकादशी को एक उपवास कर लेने से मनुष्य को हजार अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता हैं |नारद जी कहते हैं की जो दुर्लभ हैं , जिसकी प्राप्ति असम्भव हैं तथा त्रिलोकी में कठिनता से मिलती हैं | ऐसी वस्तु को प्रबोधनी एकादशी उसे देती हैं | भक्ति पूर्वक उपवास करने पर मनुष्यों को ‘ एश्वर्य , सम्पति , उत्तम बुद्धि , राज्य तथा समस्त सुख प्रदान करती हैं | मेरु पर्वत के समान जो पाप हैं उन्हें रुई की ढ़ेरी के समान जला देती हैं | पहले के हजार जन्मों के पापों का नाश हो जाता हैं | जो लोग प्रबोधनी एकादशी का मन में ध्यान करते हैं तथा जो इसके व्रत का अनुष्ठान करते हैं , उनके पितृ नरक के भय से छूटकर भगवान विष्णु के परम धाम में स्थान प्राप्त करते हैं | ब्रह्मान ! अश्वमेघ यज्ञ से भी जिस फल की प्राप्ति कठिन हैं वः प्रबोधनी एकादशी को रात्रि जागरण कर भजन कीर्तन करने से अनायास ही मिल जाता हैं | सम्पूर्ण तीर्थो में नहाकर सुवर्ण और पृथ्वी दान करने से जो फल मिलता हैं वह श्री हरि का रात्रि जागरण करने से सहज हि मिल जाता हैं | जिस प्रकार मनुष्य के लिए मृत्यु सत्य हैं उसी प्रकार धन क्षणिक हैं | ऐसी मन में धारणा कर एकाद्शिका व्रत करना चाहिए | सभी तीर्थ प्रबोधनी एकादशी करने वाले के घर में विद्यमान रहते हैं | कार्तिक मास की प्रबोधनी एकादशी पुत्र पोत्र प्रदान करने वाली हैं | जो इस एकादशी का व्रत करता हैं , वह ज्ञानी , योगी , तपस्वी और जितेन्द्रिय हो भोग और मोक्ष को प्राप्त करता हैं |

नारद जी ! प्रबोधनी एकादशी को स्नान , दान , जप , तप और होम करता हैं वह सब अक्षय होता हैं | जो मनुष्य देवोत्थानी एकादशी का उपवास करके भगवान केशव का विधिपूर्वक पूजन करता हैं वे जन्म जन्मान्तर के पाप से मुक्त हो जाते हैं | इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य श्री हरि के वैकुण्ठ धाम मे जाता हैं | बाल्यकाल , युवावस्था , वृद्धावस्था में किये हुए थौडे अथवा बहुत से सौ जन्मों में किये हुये पापों को नष्ट कर देते हैं | सर्वथा  प्रयत्न करके सम्पूर्ण मनवांछित फलों को देने वाले देवादिदेव भगवान जनार्दन की उपासना करनी चाहिये | यह पवित्र एकादशी धन – धान्य को देने वाली और सब पापों को दूर करने वाली हैं | भक्तिपूर्वक इसका व्रत करने से कोई वस्तु दुर्लभ नहीं हैं | सूर्य , चन्द्र ग्रहण  में स्नान से जो फल मिलता हैं उससे हजार गुना अधिक फल एकादशी के दिन जागरण करने से मिलता हैं | प्रबोधनी के दिन स्नान , दान , जप , तप , हवन , भगवान का पूजन इनमें से जो कुछ किया जाये उससे करोड़ गुना फल होता हैं | कार्तिक की एकादशी का व्रत न करने से जन्म भर का किया हुआ पूण्य अधुरा हैं | कार्तिक मास में नियम से विष्णु भगवान का पूजन जो नहीं करता उसके सब पूण्य वृथा हैं | इसलिए सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले भगवान विष्णु का यत्न से पूजन करना चाहिए | जो भक्त भगवान विष्णु के भजन में तत्पर होकर कार्तिक मास में पराये अन्न का त्याग करता हैं , वह चान्द्रायण व्रत का फल पाता हैं | कार्तिक मास में श्री विष्णु की कथा को पूरी अथवा उसका आधा अथवा चौथाई श्लोक कहते हैं अथवा सुनते हैं उनको सौ गोदान का फल मिलता हैं | कार्तिक मास में भगवान केशव के सामने कथा सुननी चाहिये | हे मुनि श्रेष्ठ ! जो कार्तिक मास में कल्याण – प्राप्ति के लोभ से श्री हरि की कथा का प्रबन्ध करता हैं , वह अपनी सौ पीढियों को तार देता हैं | जो मनुष्य नियमपूर्वक कार्तिक मास में भगवान विष्णु की कथा सुनता हैं वह अपने सेकड़ो कुलो का उद्धार कर देता हैं | कार्तिक मास में शास्त्राध्ययन के आनन्द से समय व्यत्तित करता हैं उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं |

हे नारद ! जो मनुष्य कार्तिक मास में अपना समय भगवद्गीता वाचन में अपना समय व्यतीत करता हैं उसकी पुनरावृति नहीं होती | जो भक्त भगवान के समक्ष अपना समय नाच गायन में व्यतीत करता हैं वह तीनों लोको के उपर विराजमान होता हैं | कार्तिक में प्रबोधनी के दिन बहुत से फल , फूल , कपूर , कुमकुम के द्वारा श्री हरि की पूजा करनी चाहिये , क्योकि उस दिन दान धर्म करने से असंख्य पूण्य की प्राप्ति होती हैं | ‘ प्रबोधनी ‘ को जागरण के समय शंख में जल डालकर अनेक प्रकार के द्रव्यों से अर्ध्य चढ़ाता हैं उसे करोड़ गुना होकर फल मिलता हैं | भोजन के पश्चात गुरु की प्रदक्षिणा , पूजा करनी चाहिए | प्रबोधनी ‘ एकादशी  के दिन जप भक्त भगवद्गीता का पाठ करता हैं उसे एक – एक अक्षर पर कपिला दान के समान फल प्राप्त होता हैं | जो अगस्त के फूल से भगवान जनार्दन का पूजन करता हैं उसके दर्शन मात्र से ही नरक की आग बुझ जाती हैं | हे नारद ! जो भक्त कार्तिक में भगवान जनार्दन को तुलसी पत्र और पुष्प अर्पित करता हैं उसके समस्त पाप जलकर नष्ट हो जाते हैं | हे मुने ! जो प्रतिदिन दर्शन , स्पर्श , ध्यान , नाम , कीर्तन , जप , स्तवन , अर्पण ,सेचन , नित्यपूजन , नमस्कार के द्वारा तुलसी से नव प्रकार की भक्ति करते हैं वे कोटि सहस्त्र युगों तक पूण्य का प्रसार करते हैं | हे नारद ! सुगन्धित पुष्पों को चढाने से जो फल होता हैं वह कार्तिक मास में तुलसी के एक पत्ते से मिल जाता हैं | कार्तिक मास में प्रतिदिन नियमपूर्वक तुलसी के कोमल पत्तो से भगवान जनार्दन का पूजन का पूजन करना चाहिये |

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