कार्तिक मास का महात्म्य | Importance Of Kartik Month

Last updated on October 25th, 2018 at 08:01 pm

कार्तिक मास का धार्मिक महत्त्व

कार्तिक मास महात्म्य के प्रकरण में ब्रह्माजी ने नारद जी से कार्तिक मास की श्रेष्टता , उसमे करने योग्य स्नान , दान ,पूजन आदि धर्मो का माहात्म्य बतलाकर स्नान की विधि एवं कार्तिक व्रत करने वालो के लिए पालनीय नियमो का वर्णन किया है |

कार्तिक मास क सम्बन्ध में ब्रह्माजी ने बताया है कि कार्तिक मास के समान कोई मास नही , सतयुग के समान कोई युग नही , वेदों के समान कोई शास्त्र नही और गंगाजी के समान दूसरा कोई तीर्थ नही तथा इसी प्रकार अन्न दान के समान कोई दूसरा दान नही है |

मनुष्य को कार्तिक मास में शालग्राम शिला का पूजन और भगवान वासुदेव का ध्यान करना चाहिए | नारद ! सब दानो से बढकर कन्या दान है ,उससे भी अधिक विद्धादान है , विद्धादान से भी अधिक गोदान का महत्व अधिक है , और अन्न दान का भी महत्त्व अधिक है , क्यों कि यह अन्न के आधार पर ही जीवित रहता हैं इसलिए कार्तिक मास में अन्न दान अवश्य करना चाहिए |

पूर्व काल  में सत्यकेतु नामक ब्राह्मण ने केवल अन्न दान से सब पुण्यो का फल पाकर परम दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त किया था |

    कार्तिके मासि विपेन्द्र यस्तु गीतां पठेन्नर: |

    तस्य पुण्यफलं वक्तुं मम शक्तिं विदधते ||

    गीतामास्तु समं शास्त्रं न भूतं न भविष्यति |

    सर्वपापहरा  नित्यं  गीतेका  मोक्षदायनी ||

जों मनुष्य कार्तिक मास में नित्य गीता का पाठ करता है उसके पुण्य फल का वर्णन करने की शक्ति मेरे में नही हैं | गीता का एक पाठ करने से मनुष्य घोर नरक  से मुक्त हो जाता हैं | एक मात्र गीता ही सदा सब पापो को हरने वाली तथा मोक्ष देने वाली हैं|

 

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                     कार्तिक स्नान एव प्रमुख व्रत

कार्तिक मास कि पूर्णिमा से पूर्णिमा तक यह व्रत किया जाता है इस व्रत को करने वाली महिलाओ को सुबह पांच बजे उठकर तारों की छावं में ठंडे पानी से स्नान किसी पवित्र नदी या तालाब में स्नान करना चाहिए | स्नान के पश्चात घर या मन्दिर आकर भगवान राधा – कृष्णा ,पीपल , पथवारी , तुलसी ,आवले ,केले कि पूजां करे और रोज पांच पत्थर रखकर पथवारी कि पूजां करे ,रोज कीर्तन करे और दीपक जलाओ | रोजाना कार्तिक माहात्म्य सुने या कहानी सुने | व्रत की समाप्ति के दिन उजमन करे |

नारायण तारायन – पहले दिन तारो का अर्ध्य देकर भोजन करे | दुसरे दिन दोहपर को भोजन करें | तीसरे दिन निराहार व्रत रखे | इस प्रकार कार्तिक मास पूरा करे | श्रधानुसार चांदी का तारा व तेतीस पेडे

बाह्मण को देवे |

तारा भोजन — कार्तिक मास में तारा देखकर भोजन करे | बाद में ब्राह्मण को भोजन  कराकर चांदी का तारा व तेतीस पेडे दान करे |

छोटी सांकली —- इस व्रत में २ दिन भोजन और एक दिन उपवास रखे | अंत में सोने या चांदी की सांकली भगवान के मन्दिर में चढ़ावे , ब्राह्मण को जिमाकर दक्षिणा देवे |

एकातर व्रत — एक दिन भोजन और एक दिन उपवास करे और अंत में ब्राह्मण को जिमाकर दक्षिणा देवे |

चंद्रायन व्रत —- इस व्रत में पूर्णमासी से उतरते कार्तिक की पूर्णमासी तक किया जाता हैं | इसमे पूर्णमासी को उपवास ,एकम को एक ग्रास , दिवितिया को दो ग्रास  इस तरह बबढ़ाकर अमावस्या तक पन्द्रह ग्रास खाने चाहिए { खाने में हलवा बना सकती हैं } अमावस्या के दुसरे दिन से एक ग्रास कम करते जाना हैं ऐसा पूर्णिमा तक करना हैं | हवन कराकर ब्राह्मण को जोड़े से जिमाकर श्रद्धानुसार दान करे |

 

तुलसी नारायण व्रत —– आवला नवमी से एकादशी तक तीन दिन निराहार उपवास करे ,विष्णु भगवान के समक्ष अखंड ज्योति जलावे ,ग्यारस के दिन तुलसी विवाह कराए ,बारस के दिन ब्राह्मण भोज {जोड़े के साथ }  करवाए , दक्षिणा देकर स्वयं भोजन करे |

अलूना पावंभर खाना —– पुरे मास या पांच दिन या तिन दिन [ बिना नमक ]  का लड्डू या हलवा या और कोई मिठाई भगवान को भोग लगाकर पाव भर खाये | लड्डू में रूपये रख कर गुप्त दान करे |

छोटी पंचतीर्थया व्रत  —— एकादशी से लेकर पूनम तक प्रात जल्दी स्नान कर भगवान का भजन कीर्तन करे इससे पुरे मास का पुण्य मिल जाता हैं |

पंचतीर्थया ——–एकादशी , ग्यारस , बारस  , तेरस , चोद्स ,पूनम के दिन  निराहार उपवास कर ब्राह्मण के द्वारा हवन करा कर पांच तार की बत्ती ,एक बडोतर की भगवान को जलावे ,दीपक की पूजा करे |

उद्यापन  में एकम के दिन पाच जोड़े – जोडे  जिमा  कर यथा शक्ति दक्षिणा और पोशाक देवे सुहाग की सामग्री व चार सुहागन स्त्रीयो को बायना देवे |