बैशाख चतुर्थी व्रत विधि ,व्रत कथा { Baishakh Chouth Vart Katha ,Vart Vidhi

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Last updated on April 22nd, 2019 at 11:33 am

बैशाख माह चतुर्थी व्रत विधि

पूजा विधि  – हल्दी , कुमकुम , मेहँदी , मोली , घी का दीपक , लड्डू गणेश जी का प्रसाद , पुष्प , लाल ब्लाउज पीस , जल क कलश  आदि | इस वर्ष चतुर्थी व्रत 22  अप्रेल सोमवार को हैं |

चौकी पर विनायक जी स्थापना कर चौथ माता के नाम की रोली , काजल , मेहँदी की तेरह तेरह टिकी लगाये | विधि पूर्वक पूजन कर ज्योत के दर्शन कर चौथ माता , बिन्दायक जी की कहानी सुनकर चन्द्रमा को अर्ध्य देकर जिम लेवे |

अर्ध्य देते समय बोले —- चन्दा हेलो उगीयो , हरिया बाँस कटाय , साजन उबा बारने , आखा पाती लाय , सोना की सी सांकली गल मोत्या रो हार बैशाख की चौथ का चन्द्रमा के अर्ध्य देता , जीवों म्हारा बीर भरतार |

बैशाख चौथ की कहानी

एक नगर में एक सेठ सेठानी रहते थे | उनके एक बेटा व बहूँ थी | बहु बरतन साफ कर पानी डालने नीचे जाती तो पडौसन पूछती आज खाने में क्या खाया ? तो वह कहती , “ बासी कुसी तर बासी “ | एक दिन जब वह बरतन साफ कर पानी फेकने गई तो  रोजाना की तरह पडौसन ने पूछा आज खाने में क्या खाया तो उसने वही रोज वाला जवाब दिया “ बासी कुसी तर बासी “ उस दिन सेठ के बेटे ने उसकी बात सुन ली और मन ही मन सोचने लगा , अभी तो यह गरमा – गरम भोजन करके आई हैं फिर ये पडौसन को बासी क्यों बता रही हैं|

दुसरे दिन उसने अपनी माँ से कहकर खीर – खांड का भोजन बनवाया | माँ व बेटा बहूँ ने साथ बैठ   प्रसन्नता से भोजन किया | बहूँ बरतन साफ कर पानी डालने नीचे गई तो पीछे – पीछे उसका पति भी गया | आज भी हमेशा की तरह पडौसन ने पूछा , आज क्या खाया तो उसका वही रोज वाला जवाब “  “ बासी कुसी तर बासी “ | उसके पति को बहुत गुस्सा आया रात्रि होने का इंतजार करने लगा जब रात्रि में पत्नी कमरे में आई हाथ पकडकर बोला मेरे सामने खीर खांड के भोजन करके आई हैं फिर पडौसन को बासी भोजन क्यों बताया | तब वह मुस्कुरा कर बोली की यह आपके पूर्वजो की कमाई हैं , यह धन ना आपने कमाया ना आपके पिताजी ने तो हुई ना बासी | यह सुनकर उसने परदेश जाने का विचार कर सुबह उठ कर माँ से बोला , माँ मैं कमाने के लिये परदेश जाऊंगा | माँ ने कहा अपने पास बहुत धन हैं | तुझे परदेश जाने की क्या आवश्यकता हैं | लेकिन वह नहीं माना और माँ की आज्ञा लेकर वह कमाने के लिए परदेश चला गया | वहाँ उसको एक सेठ के यहाँ नौकरी मिल गई , कुछ समय में ही उसने सारा काम काज सभाल लिया सेठ का विश्वास पात्र बन गया | सेठ अपना सारा कारोबार उसे सौपकर तीर्थ यात्रा पर चला गया |

इधर सास ने बहु से कह रखा था की परिन्डे का पानी और चूल्हे की आग कभी मत बुझने देना | परन्तु एक दिन चूल्हे की आग बुझ गई | बहु पडौसन के घर अग्नि लेने गई | उसने देखा की पडौस की ओरते बैसाख की चौथ माता की पूजा कर रही थी | उसने पूछा आप यह किस माता का पूजन कर रही हैं और इस पूजा को करने से क्या फल मिलता है | तब पडौसन ने कहा यह चौथ माता का व्रत हैं इस व्रत को करने से स्त्रियों को अखंड सौभाग्य , उत्तम रूप , सुख़ , गुणवान सन्तान तथा बिछड़े का मिलन होता हैं | तब उसने बताया मेरे पति परदेश गये हैं मैं भी चौथ माता का व्रत करना चाहती हूँ पर मेरी सास मुझे घर  से बाहर नहीं आने देते तो मुझे कैसे मालूम चलेगा की चौथ का व्रत कब आया | तब पडौसन ने कहा बहूँ तुम रोजाना एक डिबिया में एक दाना गेहूं रखते जाना जब तीस दाने हो जाये उस दिन चौथ माता का व्रत रख लेना और शाम को चौथ बिन्दायक जी का पूजन कर चन्द्रमा को अर्ध्य देकर फिर खाना खा लेना | साहूकार की बहूँ को पडौसन के कहे अनुसार व्रत करते बहुत समय बीत गया | चौथ माता ने सौचा की यदि इसकी नहीं सुनी तो मुझे मानेगा कौन ? तब चौथ माता ने साहूकार के बेटे को स्वप्न में जाकर कहा कि साहूका का बेटा सो रहा हैं या जग रहा हैं , तो उसने कहा ना सो रहा हूँ ना जग रहा हूँ चिंता में हूँ | इस पर चौथ माता ने कहा चिंता छोड़ और घर जाकर तेरे परिवार को सम्भाल | तब साहूकार के बेटे ने कहाँ मेरा कारोबार बहुत फैला हैं | तब चौथ माता बोली सुबह उठकर स्नान ध्यान से निर्वत हो दुकान जाकर चौथ माता का नाम लेकर घी का दीपक जलाकर बैठ जाना | जिसको लेना हैं ले जायेगा , जिसको देना हैं दे जायेगा | सुबह उसने वैसा ही किया और देखते ही देखते हिसाब हो गया और उसने घर जाने की तैयारी कर ली | घर रवाना हुआ तो रास्ते में एक सापं अपनी सौ वर्ष की आयु पूर्ण करने दाह समाधि लेने जा रहा था उसने उसको सिसकार दिया | साँप ने गुस्से में कहाँ मैं अपनी आयु पूर्ण करके मुक्ति पाने जा रहा था तूने पूझे टोक दिया इसलिये अब मैं तुझे डसुंगा , इस पर साहूकार के बेटे ने कहा मैं बारह वर्ष बाद अपने घर जा रहा हूँ में अपनी माँ व पत्नी से मिल लूँ तब डस लेना |तब साँप बोला तू घर जाकर पलंग पर सो जायेगा तब उसने कहा मैं अपनी पत्नी की चोटी  लटका दूंगा | उस पर चढकर डस लेना |

घर पहुँचा तो वह उदास था | बेटा कुछ बोला नहीं , लेकिन उसकी औरत होशियार थी , सब बात पता करके उसके कमरे की एक सीढि पर दूध , दूसरी पर चूरमा , तीसरी पर बालू रेत , इत्र , फूल आदि रखकर चौथ माता से प्रार्थना की “ हे चौथ माता मेरे पति के प्राणों की रक्षा करना | अर्ध रात्रि में साँप आया और दूध पिया , चूरमे व बालू मिट्टी में किलोले करा पर बोला साहूकार के बेटे की बहूँ सुख़ तो बहुत दिया पर वचनों का बंधा हूँ डसुँगा तो जरुर | तब चौथ बिन्दायक जी ने सोचा इसकी रक्षा तो करनी चाहिए | तब चौथ माता तलवार बनी बिन्दायक जी ढाल बने और साँप के टुकड़े हो गये , साँप  की पूछ का टुकड़ा उसकी जुती में जाकर गिर गया साँप ने सोचा डसुंगा तो जरुर तब उसकी पत्नी रोज किडी को आटा डालती थी तब सब किडियो ने मिलकर उस की पूछ को खोखला कर दिया |

साहूकार के बेटे को नींद नहीं आ रही थी | वह अपनी पत्नी के साथ चौपड – पांसा खेलने लगे | सुबह देर तक जब बेटे बहूँ नही उठे तो सहुकारनी जगाने गई तो सीढियों पर खून ही खून देखकर जोर – जोर से रोने लगी की मेरे बेटा बहूँ को किसी ने मार दिया | रोने की आवाज से बेटे बहूँ उठे और बेटे ने कहा माँ हमारा बेरी दुश्मन मरा हैं , यहाँ सफाई करवाओ तब हम बाहर आयेंगे | माँ ने वहाँ सफाई करवाई | बेटा बहु नीचे आये , बेटे ने पूछा मेरे पीछे से किसी ने कोई धर्म पुण्य किया क्या तो बहूँ ने हामी भरी तब सास बोली तू चार समय खाना खाती थी तूने क्या धर्म किया , तब बहूँ बोली “ मैं चौथ बिन्दायक जी का व्रत करती थी | एक समय का खाना पानी वाली को देती , दूसरी बार का गाय के बछड़े को , तीसरी बार का जमीन में गाड़ देती व चौथी बार का चाँद को अर्ध्य देकर स्वयं खा लेती | मैंने बनिये की दुकान से पूजा का सामान मंगवाया उसका हिसाब कर देना |

सास ने पानी वाली से पूछा तो उसने कहा महीने की हर चौथ को मुझे खाना देती थी , बछड़े के मुह से फूल गिरने लगे , जमीन में खोदा तू सोने के चक्र मिले , बनिये से पूछा तो उसने अपना हिसाब बताया | फिर बहु ने कहा अब बैशाख की चौथ का उद्यापन करना हैं |

सास बहूँ ने चौथ माता का उद्यापन धूम – धाम से किया , और सारी नगरी में कहलवा दिया की सब कोई चौथ माता का व्रत करना साल की तेरह  चौथ करना , तेरह  नहीं तो चार करना , चार नहीं तो दो चौथ माता के व्रत तो अवश्य ही करना चाहिये |

हे चौथ माता ! उस पर प्रसन्न हुई वैसी सब पर होना और सबकी मनोकामना पूर्ण करना | अमर सुहाग देना |

इस कहानी के बाद विनायक जी  की महाराज की कहानी सुने |

|| जय बोलो चौथ माता , विनायक  जी महाराज जी जय ||

विनायक  जी  कि कहानी पढने  के लिये यहा क्लिक  करे  

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