श्री हरि विष्णु के वामन अवतार की कथा | shree hari vishnu ke vaman avatar ki katha

By | July 25, 2020
shree hari ke vaamn aavtar ki katha

श्री हरि विष्णु के वामन अवतार की कथा

shree hari ke vaman avatar ki katha

एक बार दैत्य राजबली से पराजित होकर सभी देवगण भगवान श्री हरि की शरण में गए और उनसे प्रार्थना करने लगे कि हे प्रभु ! सभी देवता गण ऋषि मुनि सभी आप की शरण में आए हैं आप हमारा दुख जानकर उसका निवारण करने की कृपा कीजिए  | सम्पूर्ण चराचर में दैत्य राज बलि की दानवीरता का प्रचम फैला हैं | वे बहुत शक्तिशाली हैं | आप विरोचन पुत्र  बली का  विनाश कीजिए |

श्री हरि भगवान विष्णु  बोले- हे देवगणों! मैं इन सब से पूर्व विदित हूं कि विरोचन पुत्र बलि तीनों लोकों के लिए कष्ट दाई बना हुआ है |

आप सभी इस बात से अनभिज्ञ नहीं है कि राजा बलि ने घोर तपस्या कर वर प्राप्त किया है वह शांत है , जितेंद्रिय है , और मेरा भक्त है उसके प्राण मुझ में ही है वह सत्यवादी , दानवीर  है | उचित समय आने पर अंत होगा |

पुत्र इच्छा से देवमाता अदिति मेरी शरण में आई और मैं उनका कल्याण करूंगा अवतार लेकर देवताओं की सुरक्षा, असुरों का विनाश अवश्य ही करूंगा | इसीलिए आप लोग निश्चिंत होकर जाएं और उचित समय की प्रतीक्षा करें |

इस प्रकार के वचन सुनकर भगवान विष्णु को प्रणाम करते हुए वापस अपने अपने स्थान पर आ गए |

माता अदिति भगवान विष्णु का ध्यान करती थी | नवें महीने मां अदिति के गर्भ  से श्री हरि विष्णु ने वामन रूप धारण कर मां अदिति के गर्भ से प्रकट हुए उनके रुप्प की शोभा वर्णन करना असम्भव सा प्रतीत होता हैं | उनके पैर, छोटे सिर बड़ा, शरीर छोटा और छोटे बच्चे के समान हाथ, पैर उनका उदर आदि थे |

देव माता अदिति पुत्र को देखकर अपने मन के भाव प्रकट करना चाहती थी पर श्री हरि की कृपा से उनकी वाणी अवरुद्ध हो गई |

भाद्रपद मास के श्रवण  नक्षत्र से युक्त एकादशी तिथि में जब त्रिविक्रम वामन भगवान का पृथ्वी पर अवतार हुआ | तब पृथ्वी डगमगाने लगी और असुरों में भय का वातावरण छा गया और देवता ऋषि  मुनि  सभी प्रसन्न हो गये |

वामन भगवान के जन्म के सभी संस्कार महामुनी कश्यप ने किए थे |

वामन भगवान ने ब्राह्मण रूप धारण कर राजा बलि के यज्ञ स्थल में गए और उन्होंने बलि से कहा हे राजे मुझे तीन पग भूमि प्रदान करें | ने कहा मैंने दे दिया |

भगवान श्री हरि ने अपना शरीर इतना विशाल बना लिया कि एक पग से संपूर्ण पृथ्वी लोक को नाप लिया तथा दूसरे पग  से ब्रह्मलोक और तीसरे पग  को रखने के लिए जब कोई स्थान नहीं मिला तो देवगण ऋषि मुनि समस्त गण भगवान की आराधना करने लगे तब देव  राजबलि  ने अपना सिर प्रभु के चरणों में रखा और कहा हे प्रभु अपना चरण मेरे मस्तक पर रखें |

और राजा बलि को पाताल लोक में परिवार सहित भेज कर भगवान विष्णु ने कहा मेरे द्वारा तुम यहां सुरक्षित होकर रहोगे और सभी सुखों को प्राप्त करोगे |

श्री हरि वामन अवतार भगवान वही अंतर्ध्यान हो गए और सभी ऋषि मुनि देवगण अपने अपने स्थान पर चले गए |

फाल्गुन मास में पुष्य नक्षत्र से युक्त एकादशी होने पर उसे एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है | एकादशी के दिन उपवास कर रात्रि में भगवान वामन की प्रतिमा बनाकर पूजा अर्चना कर रात्रि जागरण करना चाहिए | भगवान की प्रतिमा के समीप कुंडा . छत्र ,  चरण पादुका  ,जनेऊ , कमंडल आदि स्थापित करना चाहिए  |भगवान श्री हरि विष्णु के वामन अवतार रूप में विधिवत पूजा करनी चाहिए तथा निम्न मंत्र से उनको नमस्कार करना चाहिए “ ॐ नम भगवते वासुदेवाय “

श्री हरि विष्णु के वामन अवतार रूप में पूजा कर रात्रि जागरण भजन मंत्र श्रीहरि का ध्यान करते रहना चाहिए | प्रातकाल उठकर प्रतिमा सहित सभी पूजन सामग्री को ब्राह्मणों को दान करें | ब्राह्मणों को भोजन करवाएं तथा शांत मन से मौन रहकर स्वयं भी भोजन करें |

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