पूर्णिमा व्रत – विधि , बैशाखी , कार्तिकी और माघी पूर्णिमा

By | April 19, 2018

पूर्णिमा तिथि चन्द्रमा की प्रिय तिथि हैं |  क्यों की इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होती हैं | इसीलिये इसे पूर्णिमा  कहते हैं | इसी तिथि को चन्द्रमा तारा से बुध नामक पुत्र को प्राप्त कर अत्यंत प्रसन्न हुए थे |

यह पूर्णिमा तिथि सभी मनोरथो को पूर्ण करने वाली हैं |  शाश्त्र में चन्द्रमा ने स्वयं कहा हैं की जों इस पूर्णिमा तिथि में भक्ति पूर्वक विधिपूर्वक मेरी पूजां करेगा , में प्रसन्न होकर उसकी सभी कामनाये पूर्ण कर दूंगा | जिसने [ व्रती ] पूर्णिमा का व्रत रखा हैं उसे चाहिए की पूर्णिमा के दिन प्रात: नदी में स्नान कर देवता और पितरो का तर्पण करें | तदन्तर घर आकर एक मण्डल बनाये उसमें नक्षत्रों सहित चन्द्रमा कर अंकित कर श्र्वेत गंध , अक्षत , श्वेत पुष्प ,धुप , दीप , घृतपक  [ घी से बने पकवान ] नैवैध्य [ मिठाइयाँ ] और श्वेत वस्त्र आदि बसे चन्द्रमा की पुजा कर उनसे क्षमा प्रार्थना करे और सांय काल इस मन्त्र से चन्द्रमा को अर्ध्य प्रदान करे —

वसन्तबान्धव विभो शितांशो स्वसित न कुरु |

गगनाणरवमानिक्य    चन्द्र    दाक्षायनिपते ||

अनन्तर रात्रि मैं मौन होकर शाक एवं तिन्नी के चावल का भोजन करे | प्रत्येक पूर्णमासी को इसी प्रकार उपवास पूर्वक चन्द्रमा की पुजा करनी चाहिए | इस प्रकार एक वर्ष पर्यन्त पूर्णिमा –व्रत करके नक्षत्र सहित चन्द्रमा की सोनें की प्रतिमा बना करके वस्त्राभूषण आदि से उसका पूजन के ब्राह्मण को दान कर दे | व्रती यदि इस व्रत को निरंतर न कर सके तो एक पक्ष के व्रत को ही करके उद्यापन कर ले |

          पूर्णिमा  व्रत करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो चन्द्रमा की तरह सुशोभित होता हैं और पुत्र –पोत्र ,धन ,आरोग्य आदि प्राप्त कर बहुत काल तक सुख़ भोग कर अंत समय में  विष्णु लोक को जाता हैं |जों पुरुष या स्त्री इस व्रत को करता हैं वें कभी धन धान्य सन्तान से रहित नही होता हैं |

वैशाखी , कार्तिकी और माघी पूर्णिमा की विधि

बैशाख ,कार्तिकी और माघ —- इन तीन महीनों की पूर्णिमाऐ स्नान दान आदि के लिये अति उत्तम हैं | इन तिथियों स्नान , दान , आदि अवश्य करना चाहिये | इन तिथियों में तीर्थों में स्नान करें और यथाशक्ति दान दे |

बैशाख —- उज्जयिनी  [ शिप्रा ]

कार्तिक —— पुष्कर

माघ —- वाराणसी [ गंगा ]

इस दिन जों पितरों का तर्पण करता हैं ,वह अत्यंत फल पाता हैं और पितरों का उद्दार करता हैं | बैशाख पूर्णिमा को अन्न , सुवर्ण और वस्त्र सहित जलपूर्ण कलश ब्राह्मण को दान करने से [ व्रत रखने वाला स्त्री या पुरूष ] व्रती सर्वथा शोक मुक्त हो जाता हैं | इस व्रत में सुन्दर मधुर भौजन से परिपूर्ण पात्र , गोउ , भूमि , सुवर्ण तथा वस्त्र आदि का दान करना चाहिये |

माघ पूर्णिमा को देवता और पितरों का तर्पण कर सुवर्ण सहित तिल पात्र , कम्बल , रुई के वस्त्र , कपास , रत्न , आदि ब्राह्मणों को दान दे|

कार्तिक पूर्णिमा को वृषोत्सर्ग करे | भगवान विष्णु का निराजन करें | हाथी , घोड़े , रथ , और घृत –धेनु आदि दस धेनुओ का दान करें और केला . खजूर , नारियल ,अनार , संतरा , ककड़ी , बैगन , करेला आदि फलों का दान करे |

इन पुण्य तिथियों में जों स्नान , दान आदि नहीं करते हैं , वे जन्मान्तरो में रोगी और दरिद्री होते हैं |

ब्राह्मणों को दान देने का तो फल हैं ही , परन्तु बहन , भानजे , बुआ आदि को तथा दरिद्र बन्धुओं को भी दान देने से बड़ा पुण्य होता हैं | मित्र ,कुलीन व्यक्ति , दरिद्री और आश से आये अतिथि को दान देने से स्वर्ग की प्राप्ति होती हैं |

कथा

सीता और लक्ष्मण सहित श्री रामचन्द्रजी जब वन चले गये थे , उस समय भरतजी अपने ननिहाल थे | इधर लोगो ने माता कोशल्या  उनके विष में सशंकित कर दिया की श्री राम चन्द्रजी के वन गमन में भरत ही मुख्य हेतु हैं | फिर जब वे ननिहाल वापस आये और उन्हें सारी बाते ज्ञात हुई तो उन्होंने माता को अनेक प्रकार से समझाया और शपथ भी ली ,पर माता को विस्वास न हुआ , किन्तु जब भरत ने कहा की माँ ! श्री राम के वन गमन में यदि मेरी सम्पत्ति रही हो तो देवताओं द्वरा पूजित तथा अनेक पुण्यो को प्रदान करने वाली वैशाख , कार्तिकी तथा माघ की पूर्णिमाऐ मेरे बिना स्नान – दान ही व्यतीत हो और मुझे निम्नं गति प्राप्त हो | इस महान शपथ को सुनते ही माता को विश्वास हो गया और उन्होंने भरत को अपने गोद में ले लिया तथा अनेक प्रकार आश्वत किया | इन तीनों तिथियों का सम्पूर्ण महात्म्य कोन वर्णन कर सकता हैं | मैंने संक्षेप में कहा हैं | इन तिथियों को जल ,अन्न , वस्त्र , स्वर्ण पात्र आदि दान करने वाले पुरुष / स्त्री इन्द्रलोक को प्राप्त करते हैं |  

                                 जय श्री राम

 

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