धर्मराज जी की परम भक्त पोपा बाई की कथा | popa baai ki katha | dharmraj ji ki bhakat popa baai

popa baai ki katha | dharmraj ji ki bhakat popa baai

धर्मराज जी की परम भक्त पोपा बाई की कथा| popa baai ki katha| dhamraj ji ki bhakat popa baai

एक गाँव में एक पोपा बाई रहती थी |  जब वह पाचं साल की थी तभी से वह नियम से धर्मराज जी व्रत की कथा सुनती थी और व्रत करती थी | एक दिन उसने अपने भाई व भाभी से कहा कि मैं शादी नहीं करुँगी |अब मैं अपना समय भगवान की पूजा अर्चना में ही बिताना चाहती हूं | इसलिए मेरी झोपड़ी गाँव के बाहर बनवा दो और गाँव मैं सबको कह दो कि वह अपनी गाय व बछड़ो को मेरे यहाँ ही घास-फूस चरने को भेज दो और जिसकी भी इच्छा हो श्रद्धा हो मुझे खाना भिजवा दो |

एक दिन नगर का राजा शिकार खेलने जंगल में आया और गाँव के बाहर जंगल के पास बनी झोपड़ी देखकर रुक गया | झोपड़ी के पास जाकर उसने आवाज लगाई कि कौन है? लेकिन भीतर से कोई आवाज ना आने पर वह लगातार दरवाजा खटखटाता रहा | तब पोपा बाई उठी और कहने लगी कि कौन हो तुम? जो बार-बार दरवाजा बजा रहे हो? क्यूँ आवाज लगा रहे हो? राजा ने कहा कि मैं यहाँ का राजा हूँ और तुम्हारे साथ विवाह करुँगा | पोपा बाई ने कहा कि जहाँ से आए हो वही चले जाओ! मैं किसी पराए आदमी का मुँह नहीं देखती हूँ |

राजा ने पोपा बाई की एक नहीं सुनी और उसे जबर्दस्ती उठाकर ले गया | तब पोपाबाई ने राजा को श्राप दिया कि तुम्हारा  सारा राज-पाट नष्ट हो जाएगा | महल में आने पर राजा की रानियों ने सारी बात सुनकर राजा से अनुरोध किया कि पोपा  बाई को वहीं वापिस छोड़ आओ | राजा जब पोपाबाई को वापिस झोपड़ी में छोड़ने जाने लगा तो रास्ते में पाप की नदी आई जिसमें राजा डूब गया | कुछ समय बाद पोपाबाई  मृत्यु के बाद धर्मराज जी के यहाँ पहुँची और धर्मराज जी ने उन्हें स्वर्ग का राज दे दिया | एक बार एक सेठ व सेठानी मृत्यु लोक से स्वर्ग लोक आए तो उसके द्वार बंद देखकर वह धर्मराजी जी से द्वार खोलने का आग्रह करते हैं | धर्मराज जी कहते हैं इस द्वार पर पोपा बाई का राज है | इस पर सेठ-सेठानी कहते हैं कि हम पोपाबाई को नहीं जानते हैं | धर्मराज जी उन दोनो की बात सुनकर कहते हैं कि तुम दोनो सात दिन तक मृत्युलोक में रहो | आठ खोपरा से राई भरकर, पाँच कपड़े ऊपर रखकर कहानी सुनकर उद्यापन करना और कहना कि राज है पोपा बाई लेखा लेगी राई राई का ।

| सारे बोलो पोपा बाई की जय |

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