दशावतार – व्रत कथा , विधान और फल

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Last updated on November 12th, 2019 at 02:56 pm

भगवान श्री कृषण कहते हैं —- राजन ! सतयुग के प्रारम्भ में भृगु नाम के एक ऋषि हुए थे | उनकी भार्या दिव्या अत्यंत पतिव्रता थीं | वे आश्रम की शोभा थी और निरन्तर ग्रहकार्य में सलग्न रहती थी | वे महऋषि भृगु की आज्ञा का पालन करती थीं | भृगु जी भी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे |

किसी समय देवासुर सग्राम में भगवान विष्णु के द्वारा असुरों  को महान भय  उपस्थित हुआ | तब वें सभी असुर महऋषि भृगु की शरण में आये | महऋषि भृगु अपना अग्निहोत्र आदि कार्य अपनी भार्या को सोंप कर स्वयं संजीवनी – विद्या को प्राप्त करने के लिये हिमालय के उत्तरी भाग में जाकर तपस्या करने लगे | वे भगवान शंकर जी की आराधना कर संजीवनी – विद्या को प्राप्त कर दैत्यराज बलि को सदा के लिए विजयी करना चाहते थे | इसी समय गरुड पर चढकर भगवान विष्णु जी वहाँ आये और दैत्यों का वध करने लगे | क्षण भर में ही उन्होंने दैत्यों का संहार कर दिया | भृगु जी की पत्नी दिव्या भगवान को श्राप देने के लिये उद्धत हो गई | उनके मुख से श्राप निकलना ही चाहता था कि भगवान विष्णु ने चक्र से उनका सिर काट  दिया | इतने में भृगु मुनि जी भी संजीवनी – विद्या को प्राप्त कर वहाँ आ गये | उन्होंने देखा की सभी दैत्य मारे गये हैं और मेरी भार्या भी मार दी गई हैं | क्रोधान्ध हो भृगु ने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि ‘ तुम दस बार मनुष्य लोक में जन्म लोंगे |

भगवान श्री कृष्ण ने कहा —– महाराज भृगु के श्राप के कारण जगत की रक्षा के लिये मैं बार – बार अवतार ग्रहण करता हूँ | जों लोग भक्तिपूर्वक मेरी अर्चना करते हैं , वे अवश्य ही इस लोक में प्रसिद्ध होकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त करता हैं |

दशावतार व्रत का विधान — भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष दशमी को संयतेन्द्रित हो नदी आदि में स्नान कर तर्पण सम्पन्न करे तथा घर आकर तीन अंजुली धान्य का चूर्ण लेकर घृत [ घी ] में पकाये | इस प्रकार दस वर्षो तक प्रतिवर्ष करें | प्रतिवर्ष क्रमश; पूरी , घेवर , कसार , मोदक , सोहालक , खण्डवेष्टक , कोकरस , अपूप , कर्णवेष्ट तथा खण्डक – ये पकवान उस चूर्ण से बनाये और उसे भगवान को नैवैध्य के रूप में समर्पित करे | प्रत्येक दशहरा को दस गौएँ दस ब्राह्मणों को दे [ चांदी अथवा पिली मिट्टी की भी दे सकते हैं ] नैवैध्य का आधा भाग भगवान को समर्पित करें , चौथाई ब्राह्मण को दे और चौथाई भाग पवित्र जलाशय पर जाकर बाद में स्वयं भी ग्रहण करे | गंध , पुष्प , धुप ,दीप आदि उपचारों से मन्त्र पूर्वक दशावतारों का पूजन करें | भगवान के दश अवतारो के नाम इस प्रकार हैं – [ 1 ] मत्स्य

[ 2 ]  कुर्म  [ 3 ] वराह  [ 4 ] नृसिंह  [ 5 ] त्रिविक्रम  {वामन } [ 6 ] परशुराम  [ 7 ] श्री राम  [ 8 ]    श्री कृष्ण [ 9 ] बुद्ध तथा कलिक |

अनन्तर प्राथर्ना करे —–

“ दस अवतारों को धारण करने वाले सर्वव्यापी , सम्पूर्ण संसार के स्वामी हे नारायण हरी ! मैं आपकी शरण में आया हूँ | हे देव ! आप मुझ पर प्रसन्न हो | जनार्दन ! आप भक्ति द्वारा प्रसन्न होते हैं | आप अपनी वैष्णवी माया को निवारित करें , मुझे आप अपने धाम में ले चले | मैंने अपने को आप के लिए सौप दिया हैं | ‘

इस प्रकार जों इस व्रत को करता हैं , वह भगवान के अनुग्रह से इस लोक में सुख़ भोग कर जन्म मरण से छुटकारा प्राप्त कर लेता हैं और सदा विष्णु लोक में निवास करता हैं |

जीवन में एक बार यह व्रत करना चाहिए | इससे अत्यंत आनन्द की प्राप्ति होती हैं