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कथाये महात्म्य

छप्पन भोग का महत्त्व | क्यों लगाते हैं छप्पन भोग | chhppan bhog

छप्पन भोग का महत्त्व | क्यों लगाते हैं छप्पन भोग | chhppan bhog

 

 

 

छप्पन भोग का महत्त्व | क्यों लगाते हैं छप्पन भोग

छप्पन भोग में भोग  को लगाए जाने वाले भोग छप्पन भोग  कहते हैं | भगवान  को  छप्पन 56 प्रकार के व्यंजनो का भोग भगवान को लगाया जाता हैं | इस भोग को छप्पन भोग कहा जाता है। छप्पन भोग रसगुल्ले से शुरू होकर इलायची पर जाकर खत्म होता है।इस भोग में छ: रसो से युक्त भोजन तैयार किया जाता हैं | छप्पन भोग में बनने वाले व्यंजन इस प्रकार हैं |

 रसगुल्ला

चन्द्रकला

रबड़ी

जलेबी

दधि

भात

दाल

चटनी

कढ़ी

साग

मठरी

वडा

कोनिका

घी

पूरी

खजरा

अवलेह

बाटी [ बालका ]

फेनी

मुरब्बा

मधुर

कषाय [ कषेले पदार्थ ]  

तिक्त [ तीखे पदार्थ ]

कटु [ कडवे पदार्थ ]

अम्ल [ खट्टे पदार्थ ]

शक्करपारा

घेवर

मेसुब

पापड़

सिरा [ हलवा

मोहनथाल

खुरमा

गेहूं दलिया

पारिखा

सौफलघा

लड्डू

दुर्धारूप

खीर [ पायस ]

मक्खन

मलाई

शाक

शहद

मोहनभोग

अचार 

मोठ

मेडका

फल

लस्सी

मठ्ठा

पान [ ताम्बुल ]

सुपारी [ सुफला ]

इलायची  [ सिता ]

 छप्पन  भोग भगवान को लगाना से मनचाहा आशीर्वाद प्राप्त होता हैं | माँ अन्नपूर्णा की कृपा  कभी भी घर में अन्न की कमी नहीं होती हैं घर में अन्न धन के भंडार सदैव भरे रहते हैं | छप्पन भोग में पचास प्रकार भोज्य प्रदार्थ एव छ: षटरस व्यंजन को भोग ठाकुर जी को समर्पित करते हैं |

एक पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान श्री कृषण अपने बाल्यकाल में माता यशोदा संग रहते थे तब माता यशोदा श्री कृषण को दिन में आठो पहर भोजन खिलाती थी | और हर पहर अलग अलग भोजन खिलाती थी त्न्ही से यह छप्पन भोग का प्रचलन हैं |एक बार ब्रजवासी इंद्र भगवान को प्रसन्न करने के लिए हवन यज्ञ का आयोजन किया जा रहा तब भगवान कृषण के ब्रजवासियो को समझाया की वर्षा भगवान इन्द्र की कृपा से नहीं गोवर्धन की कृपा से होती हैं इसलिए हमें भगवान गोवर्धन का पूजन करना चाहिए |

 

 

जब भगवान इंद्र का पूजन नहीं हुआ तो इन्द्र भगवान रुष्ट हो गये |और घोर वर्षा करने लगे | तब इंद्र के प्रकोप से सारे ब्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया लिया तव लगातार सात दिन तक भगवान श्री कृषण ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया। आठवें दिन जब वर्षा बंद  हो गई है, तब सभी ब्रज वासियों को गोवर्धन पर्वत से बाहर आने को कहा उन सात दिनों तक, दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले कृषण भगवान का लगातार सात दिन तक भूखा रहना ब्रज वासियों को बुरा लगा और ब्रजवासियो ने श्रद्धा भक्ति के रंग में रंगकर  7 दिन और अष्ट प्रहर के हिसाव से 7 x 8 = 56 व्यंजनों का भोग वाल कृष्ण को लगाया ।

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