छट व्रत की कथा ,छट पूजा 2019 | Chhat Puja 2019

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Last updated on November 12th, 2019 at 02:57 pm

तारीख – 02  नवम्बर 2019

व्रत – छट पूजा

छट पूजा कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता हैं | सूर्योपासना का यह अनुपम पर्व हैं | देश के कोने कोने में यह त्यौहार श्रद्धा एवं भक्ति से मनाया जाता हैं | छट पूजा का यह त्यौहार भगवान सूर्य और उनके पुत्र भगवान कार्तिकेय को  को समर्पित है | इस व्रत को करने से पारिवारिक सुख शांति  व मनवांछित फल प्राप्त होता हैं | छट पूजा का यह पर्व दीपावली के छह दिन बाद मनाया जाता हैं | छट पूजा में प्रत्यक्ष देवता सूर्य [ भगवान भूवन भास्कर ] का पूजन किया जाता हैं | यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता हैं | प्रथम – चैत्र मास व दूसरा कार्तिक मास में मनाया जाता हैं |

विजय की अभिलाषा रखने वाले व्यक्ति को यह व्रत अवश्य करना चाहिए |

 

छट पूजा व्रत में जानने योग्य बाते :-

प्रात: स्नान ध्यान से निर्वत होकर घी , दही , जल और फूलों से भगवान सूर्य को अर्ध्य देना चाहिए |

ब्राह्मण को अन्न दान करना चाहिए |

व्रत के दिन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए |

भूमी पर शयन करना चाहिए |

इस व्रत में फलाहार व्रत करना चाहिए |

व्रत विधि :-

यह व्रत चार दिन किया जाता हैं |

प्रथम दिन खाए नहाए :- कार्तिक शुक्ला चतुर्थी तिथि को यह व्रत प्रारम्भ होता हैं | इस स्नान का अत्यंत महत्त्व हैं |

दूसरा दिन खरना – कार्तिक शुक्ला पंचमी को खरना बोलते हैं | इस दिन पुरे दिन व्रत करके शाम को खाना खाते हैं |

षष्ठी

इस दिन छठ पूजा का प्रसाद बनाते हैं | प्रसाद व फल का पूजन कर भगवान सूर्य को अर्ध्य चढाते हैं | यह पूजा नदी या तालाब पर जाकर सूर्यास्त के समय सूर्य पूजा करते हैं |

सप्तमी

प्रातकाल सूर्य पूजा सम्पन्न कर प्रसाद वितरित करते हैं |

छट व्रत की कथा

प्रियव्रत नाम के एक राजा थे |उनके पिता का नाम स्वायम्भुव मनु था | कश्यपजी ने उनसे पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया | राजा की भार्या का नाम मालिनी था | कश्यप मुनि ने उन्हें चरु प्रदान किया | चरु प्रसाद का सेवन करने के बाद मालिनी गर्भवती हो गई और प्रतिभाशाली कुमार का जन्म हुआ परन्तु सम्पूर्ण अंगो से युक्त वह कुमार मरा  हुआ उत्त्पन हुआ था | मुने ! उस मृत बालक को लेकर राजा प्रियव्रत श्मशान गये | श्मशान में राजा प्रियव्रत को एक विमान दिखाई दिया उस पर एक अलौकिक सुन्दरी विराजमान थी | राजा ने बालक का शव धरा पर रख उस देवी की विभन्न प्रकार से स्तुति की वह साक्षात् षष्टि देवी थी | देवी ने उस बालक को अपनी गोद में उठा लिया और उस बालक को पुन: जीवित कर दिया | और राजा को आशीर्वाद दिया की तुम राजा के  स्वायम्भुव मनु के पुत्र हो तुम सर्वत्र मेरी पूजा स्तुति करो में तुम्हे कमल के समान मुख वाला पुत्र प्रदान करूंगी | उसका नाम सुब्रत होगा राजा प्रियव्रत ने देवी की आज्ञा स्वीकार कर ली और देवी अंतर्ध्यान हो गई | राजा ने षष्टि देवी की स्तुति , हवन , यज्ञ सर्वत्र करने लगे | तभी से शुक्ल पक्ष की षष्टि तिथि को माँ षष्टि देवी का पूजन होने लगा | वह बालक के जन्म के छटे दिन इक्किस्वे दिन तथा अन्न प्रश्न के समय देवी षष्टि का पूजन होने लगा | भक्त माँ षष्टि का इस प्रकार ध्यान करे – सुन्दर पुत्र , कल्याण तथा दया प्रदान करने वाली देवी आप जगत की माता हैं आपका रंग श्वेत है हीरे जवाहरात रत्नों सर जडित हैं हे परम् स्वरूपणी भगवती देव सेना की मैं उपासना करता हूँ | इस प्रकार ध्यान कर जल समर्पित करे , मन , कर्म ,वचन से देवी षष्टि का स्मरण करे |   पुष्प अर्पित करे | इस अष्टाक्षर मन्त्र का यथाशक्ति जप करे |

“ ॐ हिं षष्टि देव्यै स्वाहा “

महाराज प्रियव्रत ने षष्टि देवी की कृपा से यशस्वी पुत्र प्राप्त किया | जो कोई भी भक्त देवी षष्टि के स्त्रोत्र का पाठ एक वर्ष तक करता हैं तो उसे सुन्दर पुत्र प्राप्त होता हैं | उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं |  सन्तान को दीर्घ आयु प्राप्त होती हैं |
 

 

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