द्वादशज्योतिर्लिंग [ बारह ज्योर्तिर्लिंग ] भगवान शिव के दिव्य दर्शन

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Last updated on July 28th, 2018 at 09:22 pm

भगवान शिव परात्पर ब्रह्म हैं | उनका देव स्वरूप सभी के लिए वन्दनीय हैं | शिव पुराण के अनुसार सभी प्राणियों के कल्याण के लिये भगवान शंकर लिंगरूप में विविध तीर्थों में निवास करते हैं | पृथ्वी पर वर्तमान शिवलिंगो कि संख्या असंख्य हैं |परन्तु इन सभी में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की की प्रधानता हैं |शिवपुराण में इन ज्योतिर्लिंगों स्थान निर्देश के साथ – साथ कहा गया हैं की जों इन बारह नामों का प्रातकाल उठकर पाठ करता हैं उसके सात जन्मों के पापों का विनाश हो जाता हैं तथा इस जन्म में सम्पूर्ण सुख़ प्राप्त होते हैं |

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम |
उज्जयिन्या महाकालमोकारं परमेश्वरम ||
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम |
वाराणस्या च विश्वेशं त्र्यम्बकम गौमतीतटे ||
वैध्यनाथम चिताभुमौ नागेशं दारुकावने |
सेतुबंधे च रामेशं घुश्मेश च शिवालये ||
द्वादशैतानी नामानी प्रातरुत्थाय य: पठेत |
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेंन विनश्यति ||

भगवान सोमनाथ का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह के नीचे एक गुफा में हैं , जिसमें निरंतर दीप जलता रहता हैं | महाभारत , श्रीमद्भागवत .स्कन्दपुराण आदि ग्रन्थों में इसकी महिमा का उल्लेख हुआ हैं |

बारह ज्योतिर्लिंगस्वरूप भगवान शिव के दर्शन निम्नरूप में किये जा सकते हैं

  1. भगवान सोमनाथ ——– { प्रभासक्षेत्र }

भगवान सोमनाथ अपने दिव्य रूप में कठियावाड प्रदेश में श्री प्रभास क्षेत्र में विराजते हैं |

पुराणों के अनुसार कथा —

दक्ष प्रजापति ने अपनी सत्ताईस कन्याओ का विवाह चन्द्रमा के साथ किया था | परन्तु चन्द्रमा रोहिणी के प्रति विशेष अनुराग रखते थे | इससे दक्ष की अन्य कन्या अत्यंत दुखी रहती थी | दक्ष ने चन्द्रमा को क्षयी होने का श्राप दे दिया | चन्द्रमा के क्षयग्रस्त हो जाने पर सम्पूर्ण संसार में हाहाकार मच गया | सभी देवता इस समस्या के समाधान हेतु भगवान प्रजापति ब्रह्मा के पास पहुंचे | ब्रह्मा ने कहा —    ‘ ‘ चन्द्रमा सभी देवों के सहित महामृत्युन्जय भगवान सोमनाथ की आराधना करेके उन्हें प्रसन्न करे | शिव के प्रसन्न होने पर रोग मुक्ति सहजता से ही हो जायेगी |’ सभी देवीं ने चन्द्रमा के साथ प्रार्थना के महामृत्युन्जय शिव को प्रसन्न कर चन्द्रमा ने अमरत्व का आशीर्वाद प्राप्त किया तथा पूर्ण व क्षीण होने का वर प्राप्त किया | तथा देवताओं व चन्द्रमा की प्रार्थना पर भगवान आशुतोष भवानी सहित इस क्षेत्र में ज्योतिर्लिंग रूप में सदा निवास करने लगे |

  1. भगवान मल्लिकार्जुन { श्रीशैल क्षेत्र – मद्रास }

श्रीमल्लिकार्जुन मद्रास प्रान्त के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तट पर श्री शैल पर्वत पर अवस्थित हैं | महाभारत , शिवपुराण ,पद्मपुराण आदि ग्रन्थों में इनकी विशेष महिमा गायी गयी हैं | इनकी स्थापना , उत्पति आदि के विषय में अनेक रोचक आख्यान प्रचलित हैं |

पुराणों के अनुसार कथा –

एक बार श्रीगणपति एवं भगवान कार्तिकेय दोनों भाई विवाह के लिये लड़ने लगे |दोनों ही अपने – अपने प्रथम विवाह के पक्षधर थे | तब भगवान शंकर ने यह निर्णय दिया की जों पृथ्वी की प्रथम परिक्रमा पहले कर डालेगा , उसी का प्रथम विवाह होगा | यह सुनकर कार्तिकेय मयूर पर आरुड हो दौड़ पड़े | इधर भगवान गणपति माता – पिता [ शिव –पार्वती ] की सात परिक्रमा कर डाली , जिससे वे पहले परिक्रमा करने के अधिकारी बने | उनका विवाह सिद्धि एवं बुद्धि नाम की प्रजापति कन्याओं के साथ हुआ |

जब कार्तिकेय पृथ्वी प्रदक्षिणा कर लौटे तो उन्हे उन्हें सम्पूर्ण वृतांत ज्ञात हुआ | वे अत्यंत क्रोधित होकर क्रोंच पर्वत पर चले गये | शिव पार्वती ने उनको कई बार बुलाया पर वे नहीं आये | अंत में शिव पार्वती उन्हें मनाने के लिये क्रोंच पर्वत पहुंचे , पर उनके आने की सुचना मिलने पर कार्तिकेय वहा से भीचले गये | इधर भगवान शिव मल्लिकार्जुन रूप में उसी क्रोंच पर्वत पर स्थित हो गये | यहाँ दर्शन मात्र से ही सारी कामनाये पूर्ण होती हैं |

  1. श्री महाकालेश्वर – उज्जैन – क्षेत्र [ अवन्तिकापुरी ]

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मालवा प्रदेश में शिप्रा नदी के तट उज्जयिनी [ उज्जैन ] नामक नगरी में हैं | इस महाकालेश्वर – लिंग की स्थापना के विषय में अनेक कथाये प्रचलित हैं |

पुराणों के अनुसार प्रचलित कथा –

एक बार उज्जयिनी नगरी में राजा चन्द्रसेन के द्वारा की जा रही शिव आराधना को देखकर श्री कर नामक एक पंचवर्षीय गोप बालक बड़ा उत्कंठित हुआ | वह एक सामान्य पत्थर को घर में स्थापित कर उसकी शिव रूप में उपासना करने लगा |परिवार जनों के द्वारा संत्रास दिए जाने पर बालक श्रीकर अत्यंत भावुक होकर भगवान शंकर की उपासना में तल्लीन हो गया | उसकी पूजा एवं भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वय एक दिव्य ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गये | कहा जाता हैं की संसार के कल्याण के लिए भगवान शिव की वह दिव्य ज्योर्तिर्लिंग आज भी वहाँ विराजित हैं , और भक्तो के कष्ट दुर करता हैं |

  1. श्री ओकारेश्वर [ अमलेश्वर ]

भगवान शिव का यह परम् पवित्र विग्रह मालवा प्रान्त में नर्मदा नदी के तट पर स्थित हैं | यही मान्धाता पर्वत के ऊपर भगवान शिव ओकारेश्वर रूप में विद्धमान हैं | शिव पुराण में श्री ओकारेश्वर दर्शन का अत्यंत महत्त्व हैं |

पौराणिक कथा –

प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने , जिनके पुत्र अम्बरीक और मुचुकुन्द दोनों प्रसिद्ध भगवदभक्त हो गये हैं तथा जों स्वयं बड़े तपस्वी और यज्ञो के कर्ता थे , इस स्थान पर घोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया था | इसी से इस पर्वत का नाम मान्धाता पड़ गया |

मन्दिर में प्रवेश करने के पूर्व डॉन कोठरियों में से होकर जाना पड़ता हैं | भीतर अँधेरा होने के कारण सदैव दीप जला रहता हैं |ओकारेश्वर लिंग गडा हुआ नहीं हैं यह प्राक्रतिक रूप में हैं |इसके चारों और सदैव जल भरा रहता हैं | इस लिंग की एक यह विशेषता भी हैं की मन्दिर के गुम्बज के नीचे नहीं हैं | शिखर पर भगवान शिव की प्रतिमा विराजित हैं | पर्वत से आवृत यह मन्दिर साक्षात् ओकार स्वरूप ही दृष्टिगत होता हैं |

कार्तिक पूर्णिमा को बड़ा भरी मेला लगता हैं |

  1. श्री केदारनाथ { श्री केदारेश्वर }

भगवान आशुतोष केदारनाथ रूप में उतराखंड में पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्ररिंग पर विद्यमान हैं | शास्त्रों में केदारेश्वर सहित नर नारायण मूर्ति दर्शन फल समस्त पापों का विनाश तथा समस्त मनोकामनाए पूर्ण करने का अचूक उपाय हैं |

 पौराणिक कथा –

हिमालय के केदार श्ररिंग पर विष्णु के अवतार महातपस्वी श्रीनर एवं नारायण तपस्या किया करते थे | उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनकी प्रार्थना के अनुसार ज्योर्तिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का उन्हें वर प्रदान किया |

सतयुग में उपमन्यु जी ने यहाँ भगवान शंकर का सानिध्य बताया गया हैं | इनके दर्शन से दुर्लभ से दुर्लभ कार्य भी क्षण में हो जाता हैं |

  1. श्री भीमशंकर — { सहाद्री – मुम्बई }

भगवान भीमशंकर मुम्बई से पूर्व एवं पुन से उत्तर भीमा नदी के तट पर स्थित सहाद्री पर विराजते हैं | यहाँ से भीमा नदी निकलती हैं | मूर्ति से थौड़ा – थौड़ा जल गिरता रहता हैं | मन्दिर के पास दो कुंड हैं |

पौराणिक कथा –

जिस समय भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर का वध करके इस स्थान पर विश्राम किया , उस समय अवधका भीमक नामक एक सूर्यवंशीय राजा तपस्या करता था | भगवान शंकर जी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिया , तभी से वह दिव्य एवं अलौकिक ज्योतिर्लिंग भीमशंकर के नाम से प्रसिद्ध हो गया |

  1. श्री विश्वेश्व र ——- { कांशी }

श्री विश्वेश्वरज्योतिर्लिंग वाराणसी में श्री विश्वनाथ नाम से विराजमान हैं | इस पवित्र नगरी की बड़ी महिमा हैं|

पौराणिक कथा

कहते हैं की प्रलय काल में भी इस नगरी का लोप नहीं होता | उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल में इसे नीचे उतार देते हैं | धर्मग्रन्थों में भगवान विश्वेश्वर की अपार महिमा गायी हैं | कहा जाता हैं की इस मन्दिर की स्थापना अथवा पुन: स्थापना शंकर के अवतार भगवान आदि शंकराचार्य ने स्वयं अपने कर – कमलों से की थी |

  1. श्री त्र्यम्बकेश्वर — { नासिक }

यह ज्योर्तिर्लिंग मुम्बई प्रान्त के नासिक जिले में पंचवटी से लगभग अठारह मिल की दुरी पर हैं | गोदावरी नदी के उद्गम स्थान के समीप त्र्यम्बकेश्वर भगवान की बड़ी महिमा हैं |

पौराणिक कथा

गौतम ऋषि एवं गोदावरी नदी की प्रार्थना पर भगवान शिव ने इस स्थान पर वास करने की कृपा की | वे त्र्यम्बकेश्वर नाम से विख्यात हैं | मन्दिर के अंदर एक छोटे से गड्डे में तिन छोटे – छोटे लिंग हैं , जों ब्रह्मा , विष्णु , और शिव — इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं |

शिवपुराण के अनुसार त्र्यम्बकेश्वर का दर्शन एवं पूजन करने वालो को इस लोक में तथा परलोक में सदा आनन्द प्राप्त होता हैं |

  1. श्री वैध्यनाथ – { वैध्यनाथधाम }

श्री वैध्यनाथेश्वर वैधनाथ धाम में विराजते हैं | धर्मग्रन्थो के अनुसार यह वैध्यनाथ ज्योतिर्लिंग महान फलों को देने वाला हैं | भगवान आशुतोष की यह लिंग – मूर्ति 11 अंगुल ऊची हैं | आज भी उस पर रावण के अंगुठे का चिन्ह विराजमान हैं |

पौराणिक कथा –

इस लिंग की स्थापना के विषय में अत्यंत सुन्दर कथा आती हैं | इसके अनुसार एक बार राक्षस राज रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसन्नता के लिए तपस्या की और अपने सिर काट काट कर शिवजी के चरणों में चढ़ाने शुरू कर दिए एक एक करके नो सिर चढ़ा दिए और दसवा सिर भी काटने ही वाला था की शिवजी ने प्रसन्न होकर रावण को दसो सिर दे दिए | भगवान शिव ने वरदान मांगने को कहा | रावण ने उस दिव्य लिंग को लंका ले जाकर स्थापित करने की आज्ञा मांगी | शिवजी ने आज्ञा दी और कहा यदि मार्ग में इसे कही रख दिया तो यह वही स्थापित हो जायेगा | रावण शिवलिंग लेकर चला , पर मार्ग में लघुशंका निर्वती की आवश्यकता हुई | वह उस लिंग को एक गोप कुमार के हाथ में देकर लघुशंका – निवृति के लिए चला गया | इधर गोपकुमार ने उसे बहुत अधिक भारी अनुभव कर भूमि पर रख दिया | बस , फिर क्या था , लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे उठा न सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अगुठा गडाकर लंका चला गया | इधर ब्रह्मा , विष्णु , आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की दिव्य पूजा की | तभी से भगवान शिव वैधनाथ में रावणेश्वर रूप से स्थित हैं |

  1. श्री नागेश्वर – { द्वारकानाथ }

श्री नागेश्वर भगवान का स्थान गोमती द्वारका से बेट – द्वारका को जाते समय कोई १२ – १३ मील पूर्वोत्तर के मार्ग में हैं |  वर्तमान में यह गुजरात के बडौदा क्षेत्र में गोमती द्वारका के समीप हैं | शिवपुराण में कहा गया हैं कि जों आदरपूर्वक इसकी उत्पति और महात्म्य को सुनेगा , वह समस्त पापों से मुक्त होकर समस्त ऐहिक सुखों को भोगता हुआ अंत में परम् पद को प्राप्त होगा |

पौराणिक कथा —

एक सुप्रिय नामक वैश्य था , जों बड़ा सदाचारी , धर्मात्मा एवं शिवजी का अनन्य भक्त था | एक बार जब वह नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था , अकस्मात दारूक नामक एक राक्षस ने आकर उस नौका पर आक्रमण कर दिया | वह नाव में बैठे सभी यात्रियों को अपनी पूरी ले गया | उसने सबको कारागार में बंद कर दिया ,पर सुप्रिया की शिवर्चना वहाँ भी बंद नहीं हुई | वह तन्मय होकर शिवाराधना करता और अन्य साथियों में भी शिव – भक्ति जाग्रत करता रहा | संयोग इसकी सुचना  दारुक के कानों तक पहुची और वह उस स्थान पर आ धमका | सुप्रिया को ध्यान में देख कर ——— अरे वैश्य ! तू आँख मुंड कर कौनसा षड्यंत्र रच रहा हैं ? पर सुप्रिया पर कोई असर नहीं हुआ तो उसने सैनिको को  हत्या करने का आदेश दिया , परन्तु सुप्रिया विचलित नहीं हुआ | वह भगवान शिव का ध्यान करने लगा | भगवान शिव ने ज्योर्तिर्लिंग रूप में दर्शन देकर अपना शस्त्र दिया उसने उस राक्षस का वध किया और शिव लोक में परम् स्थान प्राप्त किया | भगवान शिव के आदेसनुसार उस ज्योर्तिर्लिंग का नाम नागेश पड़ा | इनके दर्शन का महत्त अलौकिक हैं |

  1. श्री रामेश्वर —- { सेतुबंध }

भगवान शिव का ग्यारहवा ज्योर्तिर्लिंग रामेश्वर हैं | तमिलनाडू के रामनाथ जनपद में स्थित है | यहाँ समुन्द्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर हैं | मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्री राम के कर कमलों से इसकी स्थापना हुई थी |  

पौराणिक कथा –

लंका पर चढाई करने के लिए जाते समय जब भगवान श्री राम तो उन्होंने समुन्द्र तट पर बालुका से एक शिवलिंग का निर्माण कर उसकी पूजा अर्चना की और रावण पर विजय का आशीर्वाद माँगा , जों भगवान शंकर ने प्रभु श्री राम को रावण विजय का आशीवाद प्रदान किया उन्होंने  पृथ्वी वासियों के हित के लिए ज्योतिर्लिंग रूप में सदा के लिए वही वास करने की प्रार्थना स्वीकार कर ली |

 

  1. श्री घुश्मेश्वर –  { देवगिरी }

श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग अत्यंत प्राचीन हैं | इसकी महिमा अनन्त हैं | यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट प्रान्त में दौलताबाद स्टेशन से बारह मील दुर बेरुल गावं के पास हैं |

पौराणिक कथा –

दक्षिण देश में देवगिरी पर्वत के निकट सुधर्मा नामक एक ब्राह्मण रहता था | उसकी पत्नी सुदेहा अत्यन धार्मिक एवं पतिव्रता थी | उनके कोई सन्तान नहीं थी | सुधर्मा ने ज्योतिषियों के कहे अनुसार सुदेहा की छोटी बहन से विवाह घुश्मा के साथ बापना विवाह किया | इसमे सुदेहा की भी सहमती थी | घुश्मा अत्यंत शिवभक्त थी | वह नित्य 108 पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनका पूजन करती थी | भगवान शंकर की कृपा से घुश्मा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई | सर्वत्र आनन्द मंगल छा गया | इधर सुदेहा के मन में अपनी बहन व उसके पुत्र से ईष्या भावना रखने लगी | ईष्या इतनी बढ़ गई की शने घुश्मा के पुत्र की हत्या के उसके शव को ले जाकर उस सरोवर में डाल दिया , जिसमे घुश्मा जाकर पार्थिव शिवलिंग को छोडती थी |

जब प्रात: काल घुश्मा पार्थिव पूजा समाप्त कर शिवलिंग के विसर्जन के लिए उस सरोवर में गई तो भगवान शिव की कृपा से उसका पुत्र जीवित होकर सरोवर से निकल आया | पर धुश्मा पूजा में ही लगी रही उसको उसके पुत्र के जीवित लौटने की न तो ख़ुशी हुई और न ही दुःख | उसकी तन्मयता देख कर भगवान आशुतोष वही प्रकट हो गये | और घुश्मा को वर मांगने को कहा – तब घुश्मा ने निवेदन किया —‘ प्रभो ! आप सदैव इस स्थान पर वास करे , इससे सम्पूर्ण संसार का कल्याण होगा |’

भगवान शंकर ने एवमस्तु कहकर दिव्य ज्योर्तिर्लिंग के रूप में वहाँ वास करने लगे और घुमेश्व्र्र नाम से प्रसिद्ध हुए | उस सरोवर का नाम भी शिवालय तब से शिवालय हो गया |

 शिवपुराण के ज्ञानखण्ड के अनुसार – घुमेश्व्रर महादेव के दर्शन से सब पाप दुर हो जाते हैं और सुख़ की वृद्धि उसी प्रकार होती हैं , जिस प्रकार शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की वृद्धि होती हैं |

इन  द्वादश [ बारह ] ज्योर्तिर्लिंग के नित्य दर्शन करने से असम्भव कार्य भी बिना विध्न के सिद्ध हो जाते हैं | सभी मनोकामनाये पूर्ण होती हैं |