अक्षय तृतीया महत्त्व , व्रत कथा , आखातीज Akshaya Tritiya Ka Mhttv , Akshaya Tritiya Vrt Katha

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अक्षय तृतीया , आखातीज Akshaya Tritiya :–

अक्षय तृतीय बैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया या आखातीज के नाम से जाना जाता हैं | इस दिन किये गये दान , पुण्य , जप , तप , हवन , पूजा ,पाठ वे सब अक्षय हो जाते हैं | सत्ययुग का आरम्भ भी इसी तिथि से माना जाता हैं | यह तिथि सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली एवं सभी सुखो को प्रदान करने वाली हैं | इस दिन किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए मुहूर्त कि आवश्यकता नहीं होती क्यों की इस दिन सर्वसिद्ध मुहूर्त होता हैं | इस दिन गंगा स्नान करना , भागवत पूजन करना तथा पितरों का तर्पण करना अत्यंत फलदाई माना जाता हैं |

इस वर्ष अक्षय तृतीय बुधवार 18 अप्रेल को हैं | अक्षय तृतीय [ आखा तीज ] का बुधवार को होने के कारण इस दिन किये गये पुण्य का महत्त्व और बढ़ जाता हैं | अक्षय तृतीया रोहिणी नक्षत्र एवं बुधवार को हो तो उस दिन का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता हैं |  मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन अक्षत से भगवान विष्णु का पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती हैं | [ सामान्यतया अक्षत से भगवान विष्णु का पूजन करना निषेध हैं अक्षत के स्थान पर सफेद तिल से पूजन किया जाता हैं | ] केवल इसी दिन अक्षत से भगवान विष्णु का पूजन किया जाता हैं | जों हर वर्ष अक्षय तृतीय को नियम से दान पुण्य करता हैं उस के धन का कभी अभाव नहीं होता |

अक्षय तृतीया – पौराणिक कथा

Akshaya Tritiya ki Katha

भगवान श्री कृष्ण द्वारा युधिष्टर को सुनाया गया एक आख्यान प्रसिद्ध हैं –

प्राचीन काल में प्रिय और सत्यवादी , देवता और ब्राह्मणों का पूजक धर्म नामक एक धर्मात्मा वैश्य  रहता था | उसने एक दिन कथा प्रसंग सुना की यदि बैशाख शुक्ल की तृतीया रोहिणी नक्षत्र एवं बुधवार से युक्त हो तो उस दिन का दिया हुआ दान अक्षय हो जाता हैं | यह सुनकर उसने अक्षय तृतीया के दिन गंगा में पितरो का तर्पण किया और घर आकर जल और अन्न से पूर्ण घट , सत्तु , दही , चना , गेहूं , गुड ईख , खांड और सुवर्ण श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मणों को दान दिया , उसकी स्त्री उसे बार बार मना करती थी , किन्तु वह अक्षय तृतीया को दान अवश्य करता था |

कुछ समय बाद उसका देहांत हो गया | यही वेश्य कुशावती का राजा बना |  कहते हैं की पूर्व जन्म में  अक्षय तृतीय के दिन किये दान व पुण्य के प्रभाव से उसके एश्वर्य और धन की कोई सीमा नही रही | उसने इस जन्म में भी बड़े बड़े यज्ञ किये ब्राह्मणों को दान पुण्य किये |यह उसके पूर्व जन्म में अक्षय तृतीय के इन दान देने का फल था |

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