हनुमान जी भगवान वीर बजरंग बलि का सिंदूर प्रेम

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श्री हनुमान की आराधना

भारतवर्ष में बजरंगबलि जय हनुमान जी की पूजा उपासना हर घर में बड़े व्यापक रूप से की जाती हैं | वे सभी मंगल और मोदों के मूल कारण , संसार के भार को दुर करने वाले तथा भगवान शंकर के रूद्र अवतार हैं | श्री हनुमानजी सभी प्रकार के अमंगलों को दुर करने वाले , कल्याणराशि प्रदान करने वाले हैं तथा साधू ,संत ,भक्त एवं धर्म की रक्षा करने वाले हैं | उनके हृदय में भगवान श्रीसीताराम सदा ही निवास करते हैं | हनुमान जी की सबसे बड़ी विशेषता हैं कि वे अपने भक्त की रक्षा तथा उसके भाग्य उदय के लिए सदा जागरूक रहते हैं | इसलिये वे जाग्रत देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं |

मंगल मूरति       मारुती नन्दन | सकल – अमंगल –मूल – निकंदन |
पवनतनय    संतन हितकारी | हृदय विराजत अवध बिहारी ||

हनुमान जी श्री राम के परम् भक्त हैं | हनुमानजी सर्वव्यापक हैं , किन्तु जहाँ जहाँ प्रभु श्री राम का कीर्तन होता हैं उनकी कथा होती हैं , वहाँ वहाँ वे तत्क्षण उपस्थित हो जाते हैं —

यत्र   यत्र     रघुनाथकीर्तन
    तत्र    तत्र   कृतमस्तकाज्लिम |
वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं
मारुती    नमत   राक्षसान्त्क्म ||
अर्थात जहाँ जहाँ श्री रघुनाथ जी [ के नाम , रूप , गुण ,लीला आदि ] का कीर्तन होता हैं , वहाँ वहाँ मस्तक से बंधी हुई अन्जली लगाये नेत्रोंसे हनुमानजी उपस्थित रहते हैं , राक्षस वंश का अंत करने वाले उन कालरूप मारुती को नमन करना चाहिये |

हनुमान जी का सिंदूर प्रेम

हनुमान जी के ध्यानो में उन्हें सिन्दुरारुण – विग्रह कहा गया हैं और उनकी प्रतिमाओ पर उनके नवीनीकरण के लिए व मनोकामना पूर्ति के लिए प्रत्येक मंगलवार व शनिवार को  घृतमिश्रित सिंदूर-  कल्प चढाने की परम्परा हैं | सिंदूर के विषय में यह प्रसिद्धि हैं कि उसमे, अस्थि एवं व्रर्णसंधान की अदभुत शक्ति हैं | आयुर्वेद के अनुसार सिंदूर रस एवं सिन्दुरादी तेल सभी प्रकार के व्रर्ण – विस्फोटों के संधान में अद्धभुत रूप से कार्य करता हैं |
इस समन्ध में प्रचलित कथा –

राज्याभिषेक के पश्चात जब सभी लोग दरबार में बैठे थे तो  भगवान श्री राम सभी को उपहार रूप में कुछ वस्त्र ,आभुष्ण ,रत्न आदि प्रदान कर रहे थे | उन्होंने एक दिव्य हार सीताजी को दे दिया और कहा की जों तुम्हे अत्यंत प्रिय हैं उसे तुम इसे दे सकती हैं | जगतमाता सीता की वत्सलता हनुमान जी रप अधिक थी और उन्होंने वह दिव्य हार हनुमान जी के गले में डाल दिया | हनुमान जी को बड़ा विचित्र लगा और भरे दरबार में माला के एक एक मनके को तौडकर देखने लगे | सभी दरबारी यह देख कर हसने लगे की वास्तव में हनुमान जी एक वानर ही हैं | तभी दरबार में किसी ने पूछा की आप इन मनकों को तौड – तौड कर क्या देख रहे हैं ? तब हनुमानजी ने कहा की इसकी बहुमुल्यता देख रहा हूँ पर इसमे कहीं भी भगवान मेरे प्रभु श्री राम नहीं हैं | तब उसने कहाँ की क्या तुम्हारे भीतर प्रभु राम हैं | इस बात को सुन भगवान श्री हनुमान जी ने अपना सीना फाड़ डाला और उनके हृदय में साक्षात् श्री सीताराम का नाम और उन्ही का दिव्य रूप दिखाई देने लगा |

भगवती सीता माता भी यह सब देख  रही थी , उन्होंने हनुमान जी को रोका और सिन्दुरादी तेल के सहारे उनका उपचार किया और वे सुन्दर सिन्दुरारुण – विग्रह के रूप में सुशोभित होने लगे | तब से यह परम्परा हनुमान जी पर सिंदूर लगाने की परम्परा हैं |

हनुमान जी की आराधना करने से सभी मनोकामनाए पूर्ण होती हैं |
मनोकामना पूर्ति मन्त्र —
ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा |”