बृहस्पतिवार व्रत की कथा , विधि , महत्त्व

By | November 25, 2017

 अंगीरापुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं , पुरोहित हैं |  ये अपने प्रकृष्टं ज्ञान से देवताओं को उनके यज्ञ – भाग प्राप्त करा देते थे | बृहस्पति स्वयं सुन्दर हैं और इनका आवास भी बहुत सुन्दर हैं | ये विश्व के लिये वरणीय हैं | वांछित फल प्रदान कर सम्पत्ति और बुद्दी से भी सम्पन्न कर देते हैं | ये आराधकों को सन्मार्ग पर चलाते हैं और उनकी रक्षा भी करते हैं | शरणागतवत्सलता इनमें कूट – कूट कर भरी हैं |

वर्ण – बृहस्पति देवता का वर्ण पीत [ पीला ] हैं |

वाहन – देवगुरु बृहस्पति का वाहन रथ हैं , यह सुखकर और सूर्य के समान भास्कर हैं |इनका रथ सोने का हैं , इनमे वायु के वेग वाले पीले रंग के आठ घोड़े जूते रहते हैं |

व्रत विधि

बृहस्पतिवार के दिन प्रात: स्नानादि से निर्वत हो , पंच गव्य तथा चन्दन मिश्रित जल से भगवान विष्णु और बृहस्पति देवता और केले में जल चढ़ाकर ,धुप ,दीप , पीले नैवैध्य तथा नाना प्रकार के पीले पुष्प , पिली चने की दाल और पीले फलों के द्वारा उनकी पूजा करे | भोजन में चने की दाल का होना आवश्यक हैं  नमक नहीं खाना चाहिये | पूजन के पश्चात  कथा सुनकर आरती करना अति आवश्यक हैं | यह व्रत करने से भगवान बृहस्पति देवता अति प्रसन्न होते हैं तथा धन , अन्न , और विद्या व रूपवान पत्नी गुणवान सन्तान का लाभ होता हैं |स्त्रियों के लिये यह व्रत अति आवश्यक हैं | यह पूजा केले के पेड़ में करना उत्तम माना जाता हैं |

बृहस्पतिवार व्रत की कथा

एक नगर में बड़ा व्यापारी रहा करता था | वह जहाज में माल लदवाकर दुसरे देशों को भेजा करता था और खुद भी जहाजों के साथ दुर – दुर के देशों को जाया करता था | इस तरह वह खूब धन कमाकर लाता था | उसकी गृहस्थी खूब मजे से चल रही थी | वह दान भी खूब जी खोलकर करता था | परन्तु उसका इस तरह से दान देना उसकी पत्नी को बिल्कुल पसंद न था | वह किसी को एक दमड़ी भी नही देती थी |

एक बार जब वह सौदागर माल से जहाज को भरकर किसी दुसरे देश को गया हुआ था तो पीछे से बृहस्पति देवता साधू का रूप धारण कर उसकी कंजूस पत्नी के पास पहुंचे और भिक्षा की याचना की | उस व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देवता से कहा – महात्मा जी ? मैं तो इस दान पुण्य से बहुत तंग आ गई | मेरा पति सारा धन दान में व्यर्थ ही नष्ट करता हैं | आप कोई ऐसा उपाय कीजिये जिससे हमारा सभी धन नष्ट हो जाए |इससे न तो धन लूटेगा और न ही मुझे दुःख होगा |

बृहस्पति देवता ने कहा – देवी तुम बड़ी विचित्र हो ? धन और सन्तान तो सभी चाहते हैं | पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर में भी होती हैं |यदि तुम्हारे पास अधिक धन हैं तो तुम दान – पुण्य करों | भूखो को भोजन खिलाओ , प्यासों को पानी पिलाओ , यात्रियों के लिए धर्मशाला बनाओं निर्धन कन्या विवाह करवाओं | लेकिन वह स्त्री नही मानी  उसने कहा – महात्मा जी मुझे ऐसे धन की कोई आवश्यकता नहीं जों में दुसरो को बाँटती फिरू | बृहस्पति देवता बोले – ‘ यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा हैं तो फिर ऐसा ही होगा | तुम सात बृहस्पति गोबर से लीपकर पीली मिट्टी से अपने केशों को धोना , भोजन में मास – मदिरा ग्रहण करना , कपड़े धोना , बस तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जायेगा | ‘ इतना कहकर बृहस्पति देव अंतर्धयान हो गये |

उस ओरत ने बृहस्पति देवता के कहे अनुसार सात बृहस्पतिवार वैसा ही करने का निश्चय किया | केवल छ: बृहस्पतिवार बीतने पर ही उस स्त्री का सम्पूर्ण धन नष्ट हो गया और वह स्वयं भी परलोक सिधार गई | उधर माल से भरा उसके पति का जहाज समुन्द्र में डूब गया  और उसने बड़ी मुशिकल से लकड़ी के तख्तों पर बैठकर अपनी जान बचाई | वह रोता – धोता अपने नगर वापस आ गया | वहाँ आकर उसने देखा की उसका सब कुछ नष्ट हो गया | उस व्यापारी ने अपनी पुत्री से सब समाचार पूछा | लडकी ने पिता को उस साधू [ बृहस्पति ] वाली पूरी बात बता दी | उसने पुत्री को शांत किया | अब वह प्रतिदिन जंगल में जाकर वहाँ से लकडिया चुनकर लता और उन्हें नगर में बेचता बड़ी मुशिकल से गुजारा होता था |

एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की | लेकिन व्यापारी के पास कुछ न था की उसको दही लाकर दे सके | व्यापारी दुखी मन से जंगल में चला गया और सौचने लगा की यह मेरी कैसी दशा आ गई हैं ,दान पुण्य तो दुर की बात हैं अपनी बच्ची की आवश्यकता की पूर्ति भी नहीं कर सकता | मुझसे क्या भूल हो गई की मेरे से भगवान रुष्ट हो गये | उस दिन बृहस्पतिवार था | बृहस्पति देवता ब्राह्मण का रूप धारण के व्यापारी के पास आये और उसके दुःख का कारण पूछा तो व्यापारी बोला प्रभु आप तो अन्तर्यामी हैं मेरे दुःख का कारण आप[से छुपा नहीं हैं |

बृहस्पति देवता ने कहा – भाई तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पतिवार के दिन भगवान का अपमान किया था ,इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ हैं , लेकिन तुम अब किसी प्रकार की चिंता न करों | भगवान अब तुम्हे पहले से भी अधिक धन देंगे |  तुम मेरे कहे अनुसार बृहस्पति का पाठ किया करों | दो पैसे के चने और मुनक्का लाकर जल के लोटे में डाल दो और खुद अमृत पान किया करों तथा प्रसाद खाया करों तो भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाए पूर्ण करेगे और भगवान बृहस्पति देवता अंतर्ध्यान हो गये |

अगले बृहस्पतिवार दिन उसने अधिक धन कमाया जिससे वों दो पैसो का दही अपनी कन्या को दिया और दो पैसे के चने और मुनक्का लेकर अमृत बनाकर प्रसाद बाटा और प्रेम से खाया | उसी दिन से उसकी सब कठिनाईया दुर होने लगी | परन्तु अगले बृहस्पतिवार को वह बृहस्पति देवता की कथा करना भूल गया | शुक्रवार को उस नगर के राजा ने यज्ञ किया तथा सारी नगरी में कहलवा दिया की आज कोई अपने घर में अग्नि नहीं जलाएगा | सब लोग भोजन करने गये ,व्यापारी तथा उसकी बेटी देरी से पहुचे इसलिये उन्हें महल में बिठाकर भोजन करवाया |जब पिता पुत्री भोजन करके वापस आ गये तो महारानी की दृष्टि उस किल पर पड़ी जिस पर महारानी का नौलखा हर टंगा था | महारानी को ऐसा लगा की हार व्यापारी और उसकी लडकी ले गये | राजा की आज्ञा से उन पिता पुत्री को पकड़ लिया और कारागार में डाल दिया हैं |

कारागार में पिता पुत्री अत्यन्त दुखी हुए और उन्हें भगवान बृहस्पति का स्मरण किया |बृहस्पति देवता वहाँ प्रकट हुए और व्यापारी से कहने लगे – व्यापारी तुम पिछले बृहस्पतिवार को व्रत करना भूल गये इसलिये तुम्हें कष्ट का सामना करना पड़ा | बृहस्पति वार के दिन तुम्हे जेल के बहर दो पैसे मिलेगे तू प्रसाद [मुन्नका और चने ] मंगवाना | बृहस्पतिवार के दिन  भक्ति भाव से पूजा करना | तुम्हारे सब कष्ट दुर हो जायेंगे |’ बृहस्पतिवार के दिन जेल के बाहर दो पैसे मिले |  उसने राह चलती महिला से कहा मैं बृहस्पति जी की पुजा करूंगा मुझे प्रसाद ला दो पर महिला ने कहा मैं अपनी बहु  का ब्लाउज सिलवाने जा रही  हूँ | कुछ समय बाद एक और महिला गई उसको व्यापारी ने बृहस्पतिवार के लिए चना और मुनक्का लाने को कहा महिला ले आई और बृहस्पतिवार का पूजन व्रत करूंगा | महिला का पुत्र देलोक गमन हो गया था , में तुम्हे चने लाती  हूँ | विधि पूर्वक पूजन किया महिला ने कहानी सुनी और  हाथ मैं कफन और प्रसाद लेकर महिला अपने घर चली तो देखती हैं की उसके लडके को लोग श्मशान लेकर जा रहे हैं उसने रोका और कहा मुझे अपने लडके का मुख देखने दो | लोग रुके उसने अपने लडके को अमृत और प्रसाद मुख में डाला और लड़का उठ खड़ा हुआ | अपनी माता को गले से मिला |

दूसरी स्त्री जिसने मना किया था | जब वह कपड़े लेकर लौटी और उसका बेटा घोड़ी पर बैठकर बारात लेकर निकला घोड़ी से गिर गया और मर गया |वह स्त्री रो रो कर बृहस्पति भगवान से प्रार्थना करने लगी | हे देव — मेरा अपराध क्षमा करो , मुझे क्षमा करो | उसकी प्रार्थना सुनकर बृहस्पति भगवान साधू का रूप धारण करके आये और उस स्त्री से कहने लगे — देवी ! अधिक विलाप करने की आवश्यकता नहीं हैं | तुम जेल खाने जाकर क्षमा याचना करो तब सब ठीक हो जायेगा |

स्त्री जेल खाने जाकर व्यापारी से क्षमा – याचना की मुझे क्षमा कर दो | मैंने तुम्हारा कहना नहीं माना इसलिये मेरा एकलौता लड़का घोड़ी से गिरके मर गया | तब व्यापारी ने कहा आप चिंता न करे बृहस्पति देवता सब ठीक करेंगे | तुम अगले बृहस्पतिवार आके कथा सुनना , अपने पुत्र को ठंडे स्थन पर सुगन्धित पदार्थ में रख दो | ऊ स्त्री ने ऐसा ही किया | बृहस्पतिवार का दिन आया | वह दो पैसे के चने मुन्नका और जल का लौटा लेकर जेल के दरवाजे पर आई | श्रद्धा के साथ कथा सुनी प्रसाद ग्रहण किया और प्रसाद लेकर अपने मृत पुत्र के मुख में डाला और उसका पुत्र जीवित हो गया और बृहस्पति देवता का गुणगान करती हुई अपने घर चली गई |

उसी रात्रि बृहस्पति देवता ने राजा को स्वप्न में आकर कहा — हे राजन ! जिस व्यापारी  और उसकी पुत्री को तुमने जेल में डाला हैं वह निर्दोष हैं |दिन निकलने के साथ ही तुम उन दोनों को जेल से रिहा कर दो तेरी रानी का हार उसी किल पर हैं | राजा ने प्रात: उस व्यापारी से क्षमा – याचना की और उसे बहुत सा धन देकर विदा कर  दिया |

बृहस्पति देवता ऐसे ही हैं | जिसकी जैसी मनोकामना होती हैं , वह पूर्ण करते हैं |  वांछित फल प्रदान कर सम्पत्ति और बुद्दी से भी सम्पन्न कर देते हैं | ये आराधकों को सन्मार्ग पर चलाते हैं और उनकी रक्षा भी करते हैं | शरणागतवत्सलता इनमें कूट – कूट कर भरी हैं |

 

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