दशामाता की पूजा , व्रत विधि ,कहानी | Dashamata Vart Vidhi , Kahani

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Last updated on March 25th, 2019 at 12:04 pm

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी को दशामाता का पूजन एवं व्रत करते हैं | होली के दुसरे दिन से ही दशामाता का पूजन एवं कहानी पुरे दस दिन सुनी जाती हैं | प्रतिदिन प्रात: स्त्रियाँ स्नानादि से निवर्त हो पूजन सामग्री ले कर दशामाता का पूजन करती हैं | एक पाटे [ चोकी ] पर पिली मिट्टी से एक दस  कंगूरे वाला गोला बनाते हैं | फिर उन दस कगुरों पर रोली ,काजल , मेहँदी से टिकी [ बिन्दी ] लगा कर , उन पर दस गेहूं के आँखे रख कर , सुपारी के मोली लपेट कर गणेशजी बना कर रोली , मोली , मेहँदी , चावल से गणेश जी का पूजन कर दशामाता की कहानी सुनते हैं ऐसा प्रतिदिन दस दिन तक करते हैं | जों सूत की कुकडी हल्दी की गांठ होलिका दहन में दिखाते हैं उसी कुकडी को दस दिन कहानी सुनाकर पूजन कर दस तार का डोरा बनाकर उस पर दस गांठ लगाकर कहानी सुनने के बाद गले में पहन लेते हैं , अगली दशामाता व्रत तक पहने रहते हैं ,फिर नया डोरा बनाकर पूजन कर दूसरा सूत का डोरा पहनते हैं | इस दिन व्रत रखा जाता हैं एक ही समय भोजन करते हैं |

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दशामाता की कहानी हिंदी मे:-

चैत्र के महीने में कृष्ण पक्ष की अँधेरी रात में ब्राह्मण नगरी में सूत की कुकडी से बने  डोरे दे रहा था | रानी महल के झरोखे में बैठी थी | रानी ने दासी से कहा ब्राह्मण को बुलाकर पूछो की वह नगरी में काहे का डोरा दे रहा हैं | दासी ने पूछा तो ब्राह्मण बोला चेत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को दशामाता व्रत हैं इसलिए  दशामाता व्रत  का डोरा नगरी में दे रहा हूँ |

रानी ने भी ब्राह्मण से डोरा ले लिया दशामाता की पूजा कर डोरा अपने गले में बांध लिया | राजाजी नगर भ्रमण से आये रानी के गले में कच्चे सूत का डोरा पहने देखा पूछा ये गले में सूत  का डोरा क्यों  पहना हैं ? अपने तो शाही  ठाठ हैं | राजा ने रानी से डोरा  तोड़ दिया | रानी  डोरे को पानी में घोल कर पी गई |

उसी दिन से राजा रानी की दशा खराब आ गइ  हो | राजा ने कहा की अब देश छोड़ कर कही चलो | इस नगरी में कोई काम करेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा | राजा और रानी देश छोड़ कर चले गये | राजा वहाँ से अपने मित्र के गाँव पहुंचा | वहाँ पर राजा को एक कमरा सोने के लिए दिया उस पर एक खूंटी पर नौ करोड़ का हार लटका था | उसे मोरडी निगल गई |

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प्रात: राजा उठा और अपने मित्र से बोला कि मैं यहाँ नहीं रहूँगा | क्योकि मोरडी हार निगल गई और हमारा नाम आएगा  और वह वहाँ से चले गये | मित्र की ओरत बोली की ऐसा मित्र आया जों मेरा हार चुराकर ले गया |  फिर मित्र ने अपनी औरत से कहा की ऐसी कोई बात नहीं हैं | उसकी दशा [ स्थिति ] खराब हैं | आगे गया तो रास्ते में बहन का गाँव आया | वह विश्राम करने के लिये उस गाँव की सरोवर की पाल पर बैठ गया | दासी ने देखा और रानी को जाकर बोली की आपके भैया भाभी सरोवर की पाल पर बैठे हैं | बहन ने पूछा की कैसे हाल में हैं | दासी ने कहा हाल अच्छे नहीं हैं | बहन बोली की उन्हें बोलना की वह वहीं रुके में वही आ रही हूँ |

रानी दासी के साथ वही भोजन ले गई भाई ने भोजन किया लेकिन भाभी ने खड्डा खोदकर वही गाड़ दिया | आगे एक गाँव आया वहाँ दोनों एक बगीचे में जाकर बैठे और बगीचा सुख़ गया | माली ने दोनों को निकाल दिया बोला कैसे लोग आये बगीचा सुख़ गया |

आगे गये एक नगरी में विवाह हो रहा था | कुम्हार – कुम्हारिन चंवरी ले कर रहे थे , राजा व रानी बोले हम भी चले | इतना कहते ही उनके हाथ से चंवरी गिरकर छुट गयी | आगे आये तो रानी के पीहर का गाँव आया , वे कुए के पास जाकर बैठ गई | वहाँ पर रानी के पीहर की दासी पानी भरने आयी | रानी ने उससे कहा की तेरे राजा से पूछ कर आ की हमें काम पर रखेंगे क्या ? लेकिन मेरी एक शर्त हैं कि मैं झूटे बर्तन नहीं माजुंगी  और सब काम कर दूँगी | ऐसा ही दासी ने जाकर राजा से बोल दिया की एक महिला और उसका पति कोई काम मांग रहे हैं | और उनकी शर्त भी बताई |

रानी ने बोला उन्हें बुला ले | और कोई काम  दे देंगे  दो काम  नहीं करेंगे तो कोई बात नहीं | वह दोनों पति , पत्नी आ गये | पति  को घोड़े की देखरेख का काम दे दिया और पत्नी को रसोई घर के काम में रख दिया | रानी ने नाम पूछा वह बोली दमड़ी हैं | दमड़ी [ रानी ] वहाँ रहने लगी और मन लगा कर काम करने लगी |चैत्र का महिना आया , होली बाद के दिन आये दमड़ी ने रानी से कहा आप मुझे कुछ सामान दे दो मुझे जंगल में जाकर दशामाता की पूजा करनी हैं | रानी ने सूत की कुकडी हल्दी की गांठ रोलिं , मोली , मेहँदी , काजल सब सामान लेकर दशामाता की मन से पूजा की , दशमाता का डोरा लिया व्रत कर एक समय भोजन कर आये | सब शाही ठाठ वापिस आ गये | दमड़ी ने सिर धोया तो उसके सिर में पदम् था | उसकी माँ की आँख से आंसू गिर गया तो दमड़ी बोली यहं क्या हुआ | रानी बोली ऐसा ही पदम् मेरी लडकी के सिर में भी हैं | अब क्या पता वह कहाँ हैं | उसकी याद में मेरे आंसू आ गये | इतने में दमड़ी बोली माँ में तेरी बेटी हूँ और घौड़े की रखवाली करने वाला तेरा जँवाई हैं |

ॐ तनोट माता जी की आरती यहाँ से पढ़े

माँ बोली तूने यह रूप क्यों छिपाया | मेरे हीरे जैसे जँवाई को घौड़े की रखवाली में रखा | उसने जँवाई का मान सम्मान किया नये वस्त्र पहनाये | लडकी बोली माँ बहुत दिन हो गये अब हम हमारे घर जायेंगे | लडकी को बहुत सी धन – सम्पदा देकर विदा किया |

आगे गये कुम्हार का घर आया | वहाँ कुम्हार चंवरी लेकर जा रहा था | राजा रानी गये वैसे ही टुटा हुआ कलश वापस जुड़ गया | तब कुम्हार बोला थौडे दिन पहले एक राजा रानी आये थे चंवरी टूट गई | तब राजा बोला पहले भी हम ही थे तब हमारी दशा खराब थी | आगे गये जों बगीचा सुख़ गया था वो हरा  भरा हो गया ,तो माली बोला पहले एक दुष्ट राजा रानी का पाँव पड़ते ही बाग सुख़ गया तो राजा बोला पहले भी हम आये थे पर तब हमारी दशा खराब थी | अब हमारी दशा अच्छी हो गई | जिससे तुम्हारा बाग हरा भरा हो गया | आगे चला तो मित्र का गाँव आया राजा बोले हम उसी कमरे में ठहरेंगे जहाँ पहले ठहरे थे | उसी कमरे में ठहरे और आधी रात को मोरडी ने हार उगलने लगी तो रानी ने कहा अपने मित्र को बुलाकर लाओ | मित्र ने देखा और अपनी पत्नी की तरफ से माफी मांगी और कहा औरत की बात पर मत जावों | आगे जाकर देखा तो बहन का गाँव आया | दासी पानी भरने आई और देखा और रानी को जाकर कहा आपके भैया भाभी आये हैं ,उनकी हालत भी अच्छी हैं | तब बहन वहाँ गयी और बोली भाभी घर चलो , तो भाभी बोली नहीं बाई जी हम तो आपके घर नही चलेंगे आपको शर्म आएगी |

भाभी ने खड्डा खोदा तो वहा सोने के चक्र निकले बहन ने भाई की आरती उतारी भाई ने सोने के चक्र बहन को दे दिए | और अपने नगर में आये ती वहा की प्रजा अत्यंत प्रसन्न हो गई और सारे गाँव ने  राजा रानी का स्वागत किया | और हवेली में पहले जैसे ठाठ हो गये | इसलिये कहते हैं की  दशा किसी से पूछकर नहीं आती | हे दशामाता जैसी राजा की अच्छी दशा आयी वैसे ही सब पर अपनी कृपा रखना | || जय बोलो दशामाता की जय ||