आशादशमी व्रत कथा एवं व्रत विधि

Last updated on July 18th, 2018 at 09:35 pm

प्राचीन काल में निषद देश में नल नाम के एक राजा थे | उनके भाई घुत में जब उन्हें पराजित के दिया , तब नल अपनी भार्या दमयन्ती के साथ राज्य से बाहर चले गये | वे प्रतिदिन एक वन से दुसरे वन में भ्रमण करते रहते थे , केवल जल मात्र से ही अपना जीवन निर्वाह करते थे और जनशून्य भयंकर वनों में घूमते रहते थे |एक बार राजा ने वन में स्वर्ण – सी क्रांति वाले कुछ पक्षियों को देखा | उन्हें पकड़ने की इच्छा से राजा ने उनके ऊपर वस्त्र फैलाया , परन्तु वे सभी उस वस्त्र को लेकर आकाश में उड़ गये | इससे राजा बहुत दुखी हो गये | वे दमयन्ती को गहरी निंद्रा में देखकर उसे छोड़ कर चले गये |

दमयन्ती ने निंद्रा से उठकर देखा तो नल को न पाकर वह उस घोर वन में हाहाकार करते हुये रोने लगी | महान दुःख और शोक से संतप्त होकर वह नल के दर्शन की इच्छा से इधर – उधर भटकते हुए वह चेती देश पहुंची | वहा वह उन्मत सी रहने लगी | छोटे – छोटे शिशु उसे कोतुहल वश घेरे रहते थे | किसी दिन मनुष्यों से घिरी हुई उसे चेती देश की राज माता ने देखा | उस समय दमयन्ती चन्द्रमा की रेखा के समान भूमि पे पड़ी हुई थी | उसका मुख मण्डल प्रकाशित था | राजमाता ने उसे अपने राजमहल में बुलाकर पूछा ‘ वरानने ! तुम कौन हो ? इस पर दमयन्ती ने लज्जित होकर कहा – मैं सैर्न्ध्री हूँ | मैं न किसी के चरण धोती हूँ और न किसी का झुटा खाती हूँ | यहाँ रहते हुए आपको मेरी रक्षा करनी होगी | देवी इस प्रतिज्ञा के साथ में यहा रह सकती हूँ | राजमाता ने कहा ‘ ठीक हैं ऐसा ही होगा |’ तब दमयन्ती ने वहा रहना स्वीकार किया और इसी प्रकार कुछ समय व्यतीत हुआ और फिर एक ब्राह्मण दमयन्ती को उसके माता पिता के घर ले आया | पर माता – पिता  तथा भाइयों का स्नेह पाने पर भी वह पति के बिना बहुत दुखी रहती थी |

एक बार दमयन्ती ने श्रेष्ट ब्राह्मण को बुलवाकर उससे पूछा – हे ब्राह्मण देवता ! आप कोई ऐसा दान एवं व्रत बतलाये , जिससे मेरे पति मुझे प्राप्त हो जाये |’ इस पर ब्राह्मण ने कहा – भद्रे ! तुम मनोवांछित सिद्धि प्रदान करने वाले आशादशमी व्रत को करो |’ तब दमयन्ती ने पुराणवेता उस ब्राह्मण के कहे जाने पर   आशादशमी व्रत का अनुष्ठान किया | उस व्रत के प्रभाव से दमयन्ती ने अपने पति को पुन: प्राप्त किया |

आशादशमी व्रत विधि

इस व्रत के प्रभाव से राजपुत्र अपना राज्य , किसान खेती , वणिक व्यापार में लाभ , सन्तान हिन् को सन्तान , कन्या श्रेष्ट वर प्राप्त करती हैं | और पति के चिर – प्रवास हो जाने पर स्त्री उसे शीघ्र प्राप्त कर लेती हैं |

आशादशमी व्रत किसी भी मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को किया जाता हैं | इस दिन प्रात:काल स्नान करके देवताओं की पूजा कर रात्रि में पुष्प रोली चन्दन आदि से दस आशादेवियों की पूजा करनी चाहिये | दसों दिशाओं में घी के दीपक जलाकर धुप – दीप , नैवाध्य ,फल आदि समर्पित करना चाहिये | अपने कार्य की सिद्धि के लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये  –

आशाश्रचशा: सदा सन्तु सिद्धय्नताम मे मनोरथा: |

भवतिनाम  प्रसादेन सदा कल्याणमसित्व्ती ||

‘ हे आशा देवियों ! मेरी आशाएं सदा सफल हों , मेरे मनोरथ पूर्ण हो , आपके अनुग्रह से मेरा सदा कल्याण हो |’

इस प्रकार विधिवत पूजा कर ब्राह्मण को दक्षिणा प्रदान कर प्रसाद ग्रहण करना चाहिये | इसी कर्म से प्रत्येक मास में इस व्रत को करना चाहिये | जब तक मनोकामना पूर्ण न हो इस व्रत को विधिवत करते रहे | मनोकामना पूर्ण होने पर उद्दयाप्न करना चाहिये

उद्यापन विधि

उद्यापन में आशादेवियों की सोने , चांदी अथवा पिष्टातक से प्रतिमा बनाकर घर के आगन में उनकी पूजा करके ऐन्द्री , आग्रेयी , याम्या , नैऋति , वारुणी , वाल्व्या , सौम्या , ऐशनी , अध्: तथा ब्राह्मी – इन दश आशादेवियो से अभीष्ट कामनाओं की सिद्धि के लिये प्रार्थना करनी चाहिये साथ ही नक्षत्रो , ग्रहों , ताराग्रहो , नक्षत्रों मातृकाओ , भूत – प्रेत – विनयको से भी अभीष्ट – सिद्धि के लिए प्रार्थना करनी चाहिये | पुष्प , फल , धुप ,गंध ,वस्त्र आदि से उनकी पूजा चाहिये | सुहागिन स्त्रियो को नृत्य – गीत आदि के द्वारा रात्रि जागरण करना चाहिये | प्रात: काल विद्वान् ब्राह्मणों को सब कुछ पूजित पदार्थ निवेदित करना चाहिये | बन्धु – बांधवों एवं मित्रों के साथ प्रसन्न मन से भोजन करना चाहिये |

जों इस आशादशमी व्रत को श्रद्धा पूर्वक करता हैं , उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं | यह व्रत स्त्रियो के लिये विशेष श्रेयकर हैं |