सीताष्टमी पर्व [ व्रत ] का महत्त्व , पूजन विधि 2019

By | February 27, 2019

सीताष्टमी पर्व [ व्रत ] का महत्त्व , पूजन विधि 2019

सीताष्टमी व्रत फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अत्यंत पवित्र सीताष्टमी व्रत होता हैं | जो सौभाग्यवती स्त्री इस व्रत को करती हैं उसके कुल का कभी क्षय नहीं होता , वह पुत्र , आरोग्य , धन – धान्य ,सुखद दाम्पत्य जीवन की कामना करे तथा सभी मनोरथो को प्राप्त करता हैं | माँ जगत जननी माँ सीता के आशीर्वाद से उसके कुल की वृद्धि होती रहती हैं | ऐसी मान्यता हैं की इस दिन जगतजननी माँ सीता धरती से अवतरित हुई थी | इसलिए इस तिथि को सीताष्टमी व्रत के नाम से जाना जाता हैं | इस दिन को जानकी जयन्ती के नाम से भी जाना जाता हैं |

सीताष्टमी व्रत की विधि

प्रात स्नानादि से निवर्त होकर माँ सीताऔर प्रभु श्री राम का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए |

नवीन लाल वस्त्र धारण करवाये तथा सुगन्धित पुष्प माला चढाये |

हल्दी , कुमकुम , मोली ,रोली , लड्डू अर्पित करे |

दूध , गुड से बने पकवान का भोग लगाये तथा प्रसाद भक्तो में बाँट देवे |

 परिवार सहित आप स्वयं प्रसाद ग्रहण करे |

माँ सीता के अवतरण की कथा

 त्रेता युग में मिथिला के राजा जनक के राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया था |  राजा जनक चिन्तित होकर गुरूजी से परामर्श किया तो उन्होंने सलाह दी की यदि राजा जनक स्वयं हल चलाये तो भगवान इन्द्र की कृपा उनके राज्य पर होगी | प्रजा के हित के लिए राजा जंक ने स्वयं हल चलाने का निर्णय लिया | राजा जनक जब हल चला रहे थे तो हल एक सन्दुक में जाकर फंस गया | जब खुदाई की तो  वैसे ही उन्हें सोने की ढलिया में मिटटी में लिपटी हुई सुन्दर मन को मोहित करने वाली अदभुद कन्या रूपी धन की प्राप्ति हुई | राजा जनक की ज्येष्ठ सन्तान पुत्री को पाकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और सीता नाम दिया इसी कारण माँ जनक नंदनी के नाम से विख्यात हुई | इसलिए माँ सीता को जानकी के नाम से भी जाना जाता हैं | माँ सीता का विवाह मर्यादा पुरषोत्तम प्रभु श्री राम के साथ विवाह हुआ |

 ||  जय श्री जनक नन्दनी माँ सीता की सदा ही जय हो जय हो ||

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