अशून्य शयन व्रत का महत्त्व , व्रत विधि | Ashunya shayan mahattv Vrat Vidhi

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Last updated on August 19th, 2019 at 11:24 am

अशून्य शयन व्रत का महत्त्व , व्रत विधि | Ashunya shayan mahattv  Vrat Vidhi

अशून्य शयन व्रत का महत्त्व   

श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि  को  अशून्य शयन व्रत किया जाता हैं |  भाद्रपद कृष्ण दिव्तिया तिथि 17 अगस्त शनिवार को हैं | विष्णुधर्मोत्तर , मत्स्य पुराण , पद्मपुराण , विष्णुपुराण आदि में अशून्य शयन व्रत का उल्लेख मिलता है।

चातुर्मास में  श्री हरि योग निद्रा में चले जाते हैं | श्रीहरि विष्णु की पूजा अर्चना कर अशून्य शयन व्रत किया जाता हैं | इस व्रत को करने से स्त्री वैधव्य एवं पुरुष विधुर होने के पाप से मुक्त हो जाता है | यह व्रत सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला  है तथा सुखी दाम्पत्य जीवन व्यतीत कर अंत में श्री हरिके चरणों में स्थान प्राप्त होता हैं |   चातुर्मास के चार महीनों आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक  हर माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को यह व्रत किया जाता है | इस व्रत का अनुष्ठान श्रावण मास के कृष्णपक्ष की द्वितीया से शुरू होकर कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की द्वितीया तक करने का विधान है | चातुर्मास के चार महीनों में शेषनाग की शैयापर श्रीहरि शयन करते हैं | इसीलिए इस व्रत को अशून्य शयन व्रत कहते हैं |

जिस प्रकार भगवान विष्णु के साथ माँ लक्ष्मी का साथ अनादिकाल से बना हुआ है |  उसी प्रकार सात जन्मो के बंधन में बंधे पति पत्नी का साथ मिलता हैं | अशून्य शयन व्रत  से आशय है, स्त्री का शयन पति से तथा पति का शयन पत्नी से शून्य नहीं होता | दोनों का ही साथ जीवनपर्यंत बना रहता है |  जिस प्रकार भगवान विष्णु के साथ माँ लक्ष्मी का साथ अनादिकाल से बना हुआ है | दोनों में कभी वियोग नहीं होता |

 अशून्य शयन व्रत की विधि

भाद्रपद कृष्णपक्ष की द्वितीया तिथि के दिन लक्ष्मी एवं विष्णु भगवान  मूर्ति की मूर्ति को विशिष्ट शय्या पर स्थापित कर उनका पूजन करना चाहिए |

 इस दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्य कर्मों से  निर्वत होकर संकल्प ले |

 शेष शय्या पर स्थित लक्ष्मी जी के साथ भगवान विष्णु का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए |

लड्डू और केले का भोग लगाये |

 इस दिन सम्पूर्ण दिवस मौन धारण करे |

 संध्याकाल में दोबारा स्नान कर भगवान का शयनोत्सव मनाए मंगल गीत गाये |

नृत्य कर श्री हरी को रिझाये |

चंद्रोदय होने पर ताम्र पात्र में जल, फल, पुष्प और गंधाक्षत तथा ऋतु फल  लेकर अर्घ्य दें  |

 भगवान श्री हरि एवं श्रीलक्ष्मी जी को साष्टांग प्रणाम करे |

अगले दिन किसी ब्राह्मण भोजन करवा कर मीठे ऋतु फल , अन्न , वस्त्र  दक्षिणा देकर उसे प्रेम पूर्वंक विदा करे |

इस दिन व्रती को चाहिए की माता लक्ष्मी एवं श्रीहरि की स्तुति करे |

मन्त्र :-

लक्ष्म्या न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा।

शय्या ममाप्य शून्यास्तु तथात्र मधुसूदन।।

ॐ विष्णुदेवाय नम;

ॐ महालक्ष्म्ये  नम:

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