विजया सप्तमी व्रत का महत्त्व , व्रत की विधि | Vijaya Saptmi Vrat Ka Mahattv , Vrat Ki Vidhi

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विजया सप्तमी व्रत का महत्त्व , व्रत की विधि

विजया सप्तमी व्रत किसी भी मास में शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को जिस दिन रविवार हो किया जाता हैं | इस व्रत में भगवान सूर्य की पूजा अर्चना की जाती हैं | यह व्रत पुत्र प्राप्ति तथा किसी भी कार्य में विजय प्राप्ति के लिए किया जाता हैं | इस दिन भगवान सूर्य की प्रदक्षिणा करने का विशेष महत्त्व हैं |

विजया सप्तमी व्रत की पूजन विधि

प्रातकाल स्नानादि से निर्वत होकर स्वच्छ वस्त्र अथवा नवीन लाल रंग के वस्त्र धारण करे |

पितृ पूजन व पितृ तर्पण करने के पश्चात

रोली , मोली , चन्दन , हल्दी , कुमकुम , धुप ,दीप , नैवैद्ध्य आदि से भगवान सूर्य का पूजन करे |

हाथ में नारियल लेकर पहली परिक्रमा सूर्य भगवान की करे |

हाथ में पान के पत्ते लेकर दूसरी परिक्रमा करे |

तीसरी परिक्रमा बिंजौरा नींबू लेकर करे |

चौथी परिक्रमा केले का फल हाथ में लेकर करे |

पांचवी परिक्रमा पपीते के फल को हाथ में लेकर करे |

छटी परिक्रमा पके हुए आम अथवा अनार के फल को हाथ में लेकर परिक्रमा करे |

सातवी परिक्रमा रुद्राक्ष का मोती हाथ में लेकर करे |

आठवी परिक्रमा चाँदी की अंगूठी हाथ में लेकर परिक्रमा करे |

भगवान सूर्य को अर्ध्य चढाये |

प्रदक्षिणा करते समय किसी को छुए नहीं , बिच में बैठे नहीं , किसी से बात नहीं करे , बिना रुके निर्विघ्न परिक्रमा सम्पन्न करे |

इस व्रत में पलंग पर नहीं सोना चाहिए , भूमि पर शयन करना चाहिए |

यह व्रत सात सप्तमी तक करना चाहिए |

इस व्रत में सूर्य सहस्त्र नाम का उच्चारण करना अत्यन्तं फलदाई होता हैं |

इस दिन तिल , मांस , मदिरा , असत्य बोलना , पराई निंदा का त्याग करना चाहिए |

भगवान सूर्य से क्षमा याचना करना चाहिए |

ब्राह्मण को भोजन करवाने के पश्चात लाल वस्त्र व दक्षिणा देवे |

इस व्रत को करने से विजय की इच्छा रखने वाले को विजय प्राप्त होती हैं | निर्धन धनी हो जाता हैं | पुत्रहीन को सन्तान प्राप्त होती हैं | विद्यार्थी विद्या प्राप्त करता हैं | रोगी रोग मुक्त हो जाता हैं |

इस व्रत को करने वाला स्त्री या पुरुष इस संसार में समस्त सुख भोग कर अंत में सूर्य लोक में स्थान प्राप्त करता हैं |

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