योगिनी एकादशी [ आषाढ़ कृष्ण पक्ष ] | Yogini Ekadashi [ Ashadha Krishna Paksha

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Last updated on April 25th, 2019 at 03:53 pm

योगिनी एकादशी [ आषाढ़ कृष्ण पक्ष ]

युधिष्ठिर बोले – आषाढ़ कृष्णा एकादशी का क्या नाम हैं | हे मधुसुदन ! कृपा करके मुझसे कहिये | श्री कृष्ण जी बोले – हे राजन ! व्रतो में उत्तम व्रत मैं तुमसे कहता हूँ | योगिनी एकादशी का व्रत सब पापों को दूर करने वाला भक्ति और मुक्ति देने वाला हैं | हे नृपश्रेष्ठ ! योगिनी एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाला और संसार रूपी सागर में डूबे हुए मनुष्यों को पार लगाने वाली सनातनी हैं | हे नराधिप ! यह योगिनी त्रिलोकी में सारांश हैं | पुराणों में लिखी हुई पापनाशिनी कथा का मैं वर्णन करता हूँ |

अलकापूरी का राजा कुबेर शिवजी का परम भक्त था , शिव पूजन किया करता था , उसका माली  हेममाली नाम का यक्ष था | उसकी स्त्री सुन्दरी थी | उसका नाम विशालाक्षी था |वः माली उसके स्नेह से युक्त होकर कामदेव के वशीभूत हो गया | वह मानसरोवर से पुष्प लाकर अपनी पत्नी के प्रेम में फसकर घर पर ही ठहर गया | पुष्प देने के लिए राजा के पास नहीं गया | राजा कुबेर शिवालय में पूजन क्र रहे थे | दोपहर बाद भी वह पुष्प लेकर प्रस्तुत नहीं हुआ | हेममाली अपने घर में पत्नी के साथ रमण रहा था | विलम्ब के कारण कुपित होकर राजा कुबेर बोले | हे यक्षो ! दुष्ट हेम्वाली क्यों नहीं आया ? इसका निश्चय करो | इस प्रकार बारम्बार कहने लगा | यक्ष बोले – हे नृप ! वह स्त्री प्रेमी घर पर रमण रहा हैं | इस बात को सुनकर राजा कुबेर क्रोधित हो गये शीघ्रता से हेममाली को बुलाया देर होने के कारण माली भय से व्याकुल होक्र वहा आया | राजा को नमस्कार क्र सामने खड़ा हो गया | उसको देखकर रजा कुबेर के नेत्र क्रोध से लाल हो गये | होठ फडफडाने लगे और कुपित होकर कुबेर ने कहा – अरे पापी ! दुष्ट !दुराचारी ! तूने देवता का अपराध किया हैं | इसलिए तेरे शरीर में श्वेत कुष्ट हो जाये और स्त्री से वियोग हो और इस स्थान से गिरकर नीच गति प्राप्त हो जाये | राजा के इस प्रकार कहते ही वः उस स्थान से गिर गया और उसे कुष्ठ रोग हो गया | ऐसे भयंकर वन में गया जहाँ अन्न जल नहीं मिलता था | न दिन में चैन था और न ही रात में आराम छाया में शीत और धुप में गर्मी से पीड़ित रहता था | परन्तु शिवजी के पूजा के प्रभाव से उसकी यादाश्त नहीं गई | पापयुक्त होने पर भी पहले कर्म का स्मरण बना रहा | वः भ्रमण करता हुआ हिमालय पर्वत पर चला गया | हिमालय पर मार्कण्डेय मुनि के दर्शन किये | हे राजन ! उनकी आयु ब्रह्माजी के सैट दिन के बराबर हैं | उनका आश्रय  ब्रह्माजी की सभा के समान हैं | वहां पर वह गया , उसने पाप किया था , अत: उसने दूर से ही प्रणाम किया | मुनि मार्कण्डेय ने उसे अपने पास बुलाकर यह कहा – वत्स तुम्हारे दुःख का क्या कारण हैं ? तुमने कौनसा पाप किया हैं | इस प्रकार पूछने पर वह बोला – मैं राजा कुबेर का सेवक हूँ मेरा नाम हेममाली हैं मैं नित्य मानसरोवर से पुष्प लाकर शिवजी की पूजा के लिए राजा की देता था | एक दिन मैं कामदेव के वशीभूत होकर मैं स्त्री के साथ विषय भोग में लग गया | हे मुने ! इसी से कुपित होकर मुझे श्वेत कुष्ट  और स्त्री से वियोग होने का श्राप दिया | अब मेरे किसी पूर्व जन्म के पूण्य के कारण मेरी भेट आपसे हुई | इसलिए हे मुनि आप मेरा मार्ग दर्शन दीजिये | मुनि मार्कण्डेय जी बोले – अवश्य ही तुमने सत्य कहा हैं असत्य नही कहा | इसलिए मैं पुण्यो को प्रदान करने वाला सभी पापो का नाश करने वाले योगिनी एकादशी व्रत के बारे में बतलाता हूँ |

आषाढ़ मास में कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का विधि पूर्वक व्रत एवं भगवान जनार्दन का पूजन करने उत्तम व्रत करने के प्रभाव से वः देवरूप हो गया | स्त्री से उसका मिलन हो गया और सुख प्राप्त किया |

हे नृप श्रेष्ठ ! इस प्रकार विधि पूर्वक जो व्रत तुमने किया उससे अठासी हजार ब्राह्मणों को भोज कराने से जो फल मिलता हैं वही फल योगिनी एकादशी के व्रत को करने से प्राप्त होता हैं | पापो का नाश करने वाला पुण्यो को देने वाली आषाढ़ कृष्ण एकादशी का व्रत मैंने तुमसे कहा हैं |

|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम : ||   ||  ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम : ||

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